October 24, 2026
Film

Suman Kalyanpur संगीत की मखमली आवाज अब सदा के लिए खामोश

(यह लेख स्मृति जोशी ने सुमन कल्याणपुर के लिए 2002 में लिखा था जो सुमन जी को श्रद्धासुमन बतौर दिया जा रहा है) फिल्म संगीत के सफर के षड्यंत्रों की शिकार रही सुमन कल्याणपुर की मखमली आवाज

सुमन कल्याणपुर के 1950 के दशक का हर गीत दमकते मोती की तरह है। उनकी आवाज में रस की मधुरता है। लय का कोमल प्रवाह है। उनके सुरों का श्यामल सौन्दर्य कहीं भीतर तक उतर जाता है। जब वे गाती हैं ‘न तुम हमे जानो न हम तुम्हें जाने’ तो लगता है शांत शीतल सरोवर के किनारे वक्त ठहर गया है। फिर उन्हीं की आवाज में गूंजता है ‘ये मौसम रंगी समां’ तो लगता है उसी सरोवर के किनारे खड़े वृक्ष थिरकने लगे हैं। ये खूबसूरत रस-संपत्र गीत अपने समय की जानी-मानी गायिका सुमन कल्याणपुर की आवाज में हैं। फिल्म जगत की सुनहरी मंजूषा में सुरों की कितनी ही रत्नराणियों हैं, जो सुमन का करती प्रतिनिधित्व अफसोस कि यह प्रतिभा-संपन्न गायिका आज मुंबई में खामोशी का जीवन जी रही है। हम उनके गाने आज भी सुन रहे हैं पर सुनने का धीरज हमारे पास नहीं है। उनके गीतों के भीतर का सूनापन हमें स्तब्ध कर देता है, लेकिन उनके फिल्मी जीवन ने जो सूनापन उन्हें दिया है। वह हम बांटना नहीं चाहते। यह उपेक्षा और निष्ठुरता उनके जीवन में आज से नहीं है। वे जब इस रंगीन दुनिया में अपने सुरों के सहारे आई थी उसी समय से यहाँ की राजनीति और चालाकी से उनका परिचय हो गया था। सुमन नहीं जानती इसे वे अपना दुर्भाग्य कि उनकी आवाज स्वर लताजी की आवाज से मिलती है। इसी साम्यता ने फिल्म उद्योग में उन्हें ऊंचाइयां दीं और इसी साम्यता ने उनके रास्तों में अनगिनत रुकावटें भी पैदा कीं। कभी फिल्में मिलते-मिलते रह गई, कभी गीतों के रिकॉर्ड बनने से रोके जाते तो कभी फिल्मों से गीत ही उड़ा दिया जाता। इस सबके चलते भी उन्होंने लगभग 135 फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरा है।
बेरुखी दिखी तो गाना छोड़ दिया
हीराबाई बड़ोदकर, अब्दुल करीम खान, एमजी रांगणेकर जैसे महान संगीतज्ञों को सुनते और मां से सबसे ज्यादा प्रभावित सुमन को स्कूल की संगीत प्रतियोगिताओं में उनके सुरीले कंठ ने खूब दाद बटोरी। आकाशवाणी ने उनकी आवाज को पहचान दी। मराठी में गीतकार यशवंत देव ने उन्हें पहला मौका दिया। मराठी फिल्म की रिकॉडिंग के दौरात ही उन्हें 1954 में पहला अनुबंध मिला लेकिन उन संगीतकार को निर्माता ने फिल्म से हटा दिया और ओपी नैयर को संगीत निर्देशन मिला तो उन्होंने सुमन की जगह दूसरी गायिकाओं से डब करा लिए और सुमन के हिस्से सिर्फ एक गीत बचा। यही उनकी पहली हिन्दी फिल्म की पहली चोट थी। फिर शाहिद लतीफ की ‘दरवाजा’ (1954) मिली। सही मायनों में यही उनकी पहली फिल्म है। मराठी और हिन्दी गीतो के अलावा उन्होंने गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, मैथिली, असमिया, उड़िया, बांग्ला एवं कन्नड़ भाषाओं के भी गीत गाए। १९५४ से १९८० तक उनकी संगीत यात्रा-उतार-चढ़ाव से गुजरती रही। 1981 में परिस्थिति बहुत बदल गई। संगीतकारों का रुखा और अजीब रवैया उनके प्रति बढ़ने लगा। परेशान सुमन ने मनमोहन देसाई की फिल्म ‘नसीब’ (1981) के बाद फिल्मी गायन छोड़ने का निर्णय ले लिया। 1995 में स्व. गुलशन कुमार उन्हें ‘सुनहरी यादें कैसेट में फिर लेकर आए। इस कैसेट में उन्होने स्वयं के गाए 14 लोकप्रिय तरानों को आधुनिक रिकॉर्डिग तकनीक के साथ गाया है। मराठी भावगीत, अभंग, गणेश स्तुति जैसा गायन वे करती रहीं, लेकिन इस दूसरी पारी ने भी उन्हें निराश ही किया और सुमन विवश हो गईं दूसरे संन्यास के लिए। अब कोई नहीं है, जो उनके लिए गुनगुना सके ‘मेरे महबूब न जा. आज की रात न जा होने वाली है सहर, थोड़ी देर और ठहर।’

सुमन के गीत

‘अजहूं न आए बालमा’
“गरजत बरसत सावन’
“न तुम हमें जानो “
‘अपने पिया की मैं तो’
‘वे मौसम रंगी समां’
‘जूही की कली मेरी लाडली’
“मेरे महबूब न जा’
“शराबी-शराबी ये सावन का मौसम’
“चले जा, चले जा, चले जा’
“पानी में जले मेरा गोरा बदन’