मौसमे गुल है चाय के कप में आ जाने का नाम
डॉ. सेहबा जाफरी
सूरज खिलने लगा है, दिन लम्बे चौड़े होने आये हैं, बारिशों की आरिशें नए नए पत्तों में तब्दील हो सितम्बर के सितम ढाने के अंदाज़ देख रही है, जवान जहान अक्तूबर चीख चीख कर आफत किए दे रहा है, और ऐसे में पूरे हिन्दोस्तान में धूप से आंख मिचौली खेलता एक नया मौसम करवट लेने लगा है गुलगेंदे के खिलने का मौसम, कॉसमॉस पेटूनिया और गुल दाऊदी के खिलखिलाने का मौसम, चाय के बागानों के महक जाने का मौसम और समोवार की हिद्धतों को पूरी शिद्दत से चाहने का मौसम। वही एक मौसम कि जिसमें हिन्दोस्तान के अमूमन हर बड़े शहर में चाय के चाहने वाले चाय की तरफ लौटने लगते हैं, जगह जगह चाय की पुकार पड़ने लगती है और कुदरत की गोद से निकल कर, कपों में ढल कर चाय गोया टॉनिक बन कर रोज़ रोज़ जीते जाने का हौसला देने लगती है।

किसी गुमनाम पहाड़ी खेत के झीने आँचल में जिंदगी की ख्वाहिशें समेटे इसके बीज यूं ही तो जीने का हुनर नहीं देते। मानसून में अँखुआते, सितम्बर की नम मिट्टी में पखुआते, मौसमे बहार के बेहद नाजुक फूलों से घिरे पहाड़ी फ़िज़ा की गोद में परवरिश लेते किसी शरीर झरने से जिन्दगी उधार ले, जब ये लहराती बलखाती सडकों से नीचे बाज़ारों में आते हैं, गुमनाम नहीं रहते। रंग बिरंगे पैकिटों में बंद हो इन्हें नाम मिलता है। सच ही तो है, कुदरत के अलावा कोई और अगर आसाइशें देता है तो हमसे हमारे वुजूद की पहचान छीन लेता है।
तब चाय, चाय न रह कर एक ब्रांड बन जाती है। टाटा, वाघबकरी, लिप्टन, मिल्टन, चाय चाहे जो भी हो कुदरत की काश्तकारी और फिर कारखाने से केतली तक का सफर इतना आसान नहीं होता, कभी कुटना, पिसना, कभी चुनना, उनना और फिर एक प्याला महक, एक प्याला मोहब्बत, एक प्याला जज़्बात और एक प्याला ज़िन्दगी। धीरे से कहने और चुपके से सुनने के फ़ासलों के बीच कुछ होता है जो फलसफा बन ज़िन्दगी को धड़कना सिखाता है।
वजह हो या बेवजह, हिन्दोस्तान वह वाहिद मुल्क है जहां चाय पीने का कोई वक्त नहीं होता। कभी कोई याद आ गया तो चाय, कभी कुछ याद न आया तो चाय। कोई मिला तो चाय, कोई बिछड़ गया तो चाय, फिर हर एक प्याली के साथ कुछ लम्हे रुकते हैं और मीठी सी यादें, गर्माती हुई आँखों से बह निकलती है बिलकुल चाय के प्याले से उठने वाली भाप के जैसी। सच मानो उस भाप में कितने ही चेहरे बनते हैं, गांव वाले घर में, दादी के दुपट्टे से लिपटे दो आने के बिस्किट से शुरु हो, अपने पहले साइंस टीचर देवनारायण भावसार सर को पढ़ाने के बीच दो बजे की चाय देने के दौरान उनसे सुने क़िस्सो कहानियों तक, रजनी की मम्मी के हाथों की चाय से लगा मीना दीदी के मनुहार कर दूध जलेबी के साथ भी चाय पीने वाले दिनों तक, बड़े भाई बहिनो के दोस्तों के लिए चाय बना कर देने से लगा मेरे और कीर्ति के सुबह सुबह साथ साथ चाय पीने वाले दिनो तक, चंचला, आशा, स्वर्णलता, ऋषि और इरफान से लगा ममता दीदी तक और भारती दीदी के हाथों की चाय का तो कहना ही क्या। फिर मोनिका भाभी के घर झूले में बैठ कर अच्छू गुन्नू के हाथों बनी चाय और और उनके बगीचे का ऑस्कर वाइल्ड वाला फ्लेवर। फिर डॉ. शीरीन की मोहब्बत वाली चाय कि जिस पर ताजमहल वार देने की जुर्रत कर लूँ या रिसर्च पेपर लिखने के दौरान मेरे घर आये स्टूडेंट्स के हाथों बनी बेहद मुहब्बत, मनुहार और इसरार वाली चाय मुड़ कर देखती हूँ तो पाती हूँ कि कितने प्यारे लोग थे, कितने सुन्दर दिना एक एक घूँट में ताजगी भी, एक एक चुस्की में अपनापन। स्मृति दीदी के घर रवायती चाय की कोई जगह नहीं, चीन, जापान और दुनिया भर के बेशकीमती जायकों के साथ उनकी बालकनी से दिखने वाले वंडर लैंड के व्यू में कभी कभी लगता है अब ऐलिस अपने खरगोशों के साथ लाल पान की बेगम समेत चाय का लुत्फ़ लेती दिखाई देगी कि तब देगी, और जैसे चाय न पीकर हम कुछ लम्हा जिन्दगी ही पीते हैं
यादों में अपने हॉस्टल के दोस्तों को देखें तो लगता है गोया चाय उनकी महबूबा ही थी। कभी एक वक्त के खाने के पैसे बचाने में मदद देने वाली या फिर ज़िन्दगी से बेज़ार, माइक्रो बायोलॉजी लैब में हॉट एयर ओवन में अपने स्केपल, नाइफ या पेट्री प्लेट्स सुखाते हुए, उकताए हुओं की उकताहट मिटाने वाली। और यक़ीन मानें, इस लिहाज़ से यह कभी दौलतमंदों की दोस्त नहीं रही, इसने हमेशा रात भर मिल में काम करते मज़दूरों, झोपड़ी में सोते किसानों और सिस्टम से नाराज़ आम आदमियों की दुखती टीसों और धके जहनों को ही सहारा दिया है। मेरी अक़ीदत चाय के लिए और पुख्ता हो उठती है जब अक्सर वक्त न होने पर मैं अपनी चाय का कप डाइनिंग टेबल पर अनछुआ ही छोड़ कर आ जाती हूँ और बेहद शफ्कृत से मुन्ने भाई अपनी लाई चाय रख जाते हैं, बेहद संजीदा और धुन के पक्के मुन्ने भाई सिर्फ चाय ही नहीं, सुबह सुबह भाग दौड़ में घर से निकल कर काम पे आने वाली अपनी बहिनों का दर्द समझते हैं। उन्हें खूब ख्याल है कि किसे खाली चाय नहीं चलती, किसे फीकी चलती है, कौन कॉफी का दीवाना है और किसके लिए पानी की बोतल ले हो जाना है, गरज़ ये कि सूरज आने में लेट हो जाए, बारिशें अपना रास्ता भूल जाएँ पर मुन्ने भाई !!! विला नागा और बिना कीमत का तकाजा किये हर बड़े छोटे, सीनियर जूनियर, और अमीर गरीब सबसे लिए चाय रख ही जाते हैं। रुकिए। इसे सिर्फ चाय मत कहिये साहबा यह एक बेहतर लैक्चर की आवाज़ भी है और बेहतरीन कल का आगाज़ भी कि एक दिन, एक तयशुदा मुद्दत के बाद हम सब अलग हो जायेंगे, वक्त हमसे हमारा हाफ़िज़ा छीन लेगा, नज़रो का धुंधलापन, शक्लों की शिनाख्त में कच्चा पड़ जाएगा, पर चाय की सौंधी महक जहन में एक तस्वीर बना देगी, यकीनन वह तस्वीर मुन्ने भाई की होगी,
आज भी देर रात, अपने कमरे में चन्दन की एक अगरबत्ती सुलगा, अपने बिस्तर पर बैठ, लैम्प की मद्धम सी रोशनी में कुछ लिख रही होती हूँ तो माँ कांपते हाथों से तुलसी और अदरक की एक प्याली चाय रख मुस्कुरा कर कहती है। असली चाय तो वही है जो भीगे, अंधेरे, ठन्डे और उदास दिनों में अपनी मोहब्बतों की हिद्धत भर दे।।। उनकी सूखी मुस्कराहट ज़हन को ख्यालों से और कलम को लफ़्ज़ों से भर देती है।।। कितनी बिछड़ी राहें हैं जो आवाज़ देकर कहती हैं कभी फुर्सत मिले तो किसी कोहरे वाले दिन अपनी कार उठा, हम तक भी रास्ता भूल जाना पर रहगुजर, रास्ते और पगडंडियां कब पीछे छूट माजी हो जाते हैं और जिन्दगी रोज़ रोज़ हाथ से फिसली जाती है हमें एहसास ही नहीं होता।
कितनी यादें मिलती हैं जुड़ती है और धीरे धीरे कानों में सरगोशियां करती कहती है। हमारे चाय पर आने का कोई वक्त नहीं होता पर चाय पीते वक्त हमें तुम बहुत याद आती हो।।।। आजकल तो साहब। मौसम की मिज़ाजपुरसी में भी चाय साथ नहीं चाय साथ नहीं आती, किसी को एसीडिटी है किसी को अपच, कोई दूध की नहीं पी नहीं सकता तो किसी को अपराजिता की ही पीनी है,
गरज़ ये कि वक़्त बदल चुका है, लोग तन्हां रहना और चाय के बिना जीना सीख गए हैं। लोगों की भीड मिलती हैं जुड़ती हैं और धीरे धीरे कानों में सरगोशियां करती कहती हैं, हमारे चाय पर आने का कोई वक्त नहीं होता पर सच मानों चाय पीते वक्त हर्मे तुम बहुत याद आती हो।।।’ सच है, इन यादों को यूं कहना भी चाहिए वरना ज़िन्दगी अपने सम पर धड़कना भूल जाएगी।
और जिंदगी की बयाज़ों से चाय लफ़्ज़ मिट जाए इसके पहले चलते चलते क्यों न याद कर लूं स्मृति दीदी के हाथों मिला , बशीर बद्र साहब का वह कलेक्शन ” अल्लाह हाफ़िज़” कि एक सर्दी की सुबह इंदौर वाले घर में एक बार हाथों में बड़ी मोहब्बत से चाय की प्याली थमा, वे बोली थीं, ” कोहरे के लरज़ीदा हाथों में अक्सर/ तुलसी और अदरक की चाय छलकती है…”
इन लफ़्ज़ों के साथ, ” चाय मुबारक”
