गाली चिंतन और इसकी कोचिंग क्लास की संभावनाएं
आदित्य पांडे जंतर मंतर के बाद जिस तरह से गालियों का ग्लोरिफिकेशन हो रहा है, हमें भी सीख ही लेनी चाहिए
गालियों पक्ष में पिछले कुछ दिनों में इतना चिंतन, मनन और लेखन हो चुका है कि जो गालियां नहीं देते वे खुद को अपराधी की तरह मानने लग पड़े हैं। कोई बता रहा है कि गालियां देने से मन साफ हो जाता है इसलिए जो लोग गालियां नहीं दे सकते उनके मन कलुष से भर जाते हैं तो वहीं कोई समझा रहा है कि नई पीढ़ी तो ऐसे ही बेलौस गालियां देने वाली है। पहले यह तय था कि यदि कोई गालियां दे रहा है तो लगभग शत प्रतिशत संभावना है कि वह नशे में है और नशे का सुरुर हटते ही वह शरणागत हो जाने वाला है। कुछ के लिए यह रुटीन जैसा भी था लेकिन गालियां इतनी बेहतरीन चीज हैं, ये दुनिया को बदल देने वाली हैं, ये महिला सशक्तिकरण की नई धारा बहाए ला रही हैं जैसी बातें तो बस अभी ही पता चल रही हैं। जो महानुभाव इन गाली दे रही महान शख्सियतों को दुनिया के लिए परिवर्तन के हरकारे बता रहे हैं वे निश्चित ही अपने बच्चों को किसी अकादमिक पढ़ाई के बजाए गालियों की क्लास में भेजते होंगे। जिस तरह से और जितने अलग अलग तरीके से गालियां देने वालों को पिछले दिनों आदर्श की तरह पेश किया जा रहा है उससे लग रहा है कि आने वाले समय में नीट, क्यूट और आईएएस बनवाने के लिए चल रही कोचिंग की ही तरह गालीबाजी की भी कोचिंग की बड़ी बड़ी दुकानें खुल जाने वाली हैं। जिनमें बताया जाएगा कि आप किस तरह कैमरे पर धाराप्रवाह गालियों के बीच कैमरे पर देखते हुए किसी भी मुद्दे पर बोलें ताकि लाइक कमेंट्स और शेयर का अपना करियर खड़ा कर सकें और यदि आप इसमें ज्यादा ही बेहतर कर गए तो सब्सक्राइब वाला पैसा भी कमा सकते हैं और कोलेब वाले भी आपके पीछे पीछे घूमेंगे। जिस लड़की को जंतर मंतर पर गालियां बकते हुए देखने से पहले बमुश्किल कुछ लाइक्स आते थे उसके पास लाख फॉलोअर्स हैं, जिस असफल मॉडल को कोई एजेंसी काम देने को तैयार नहीं थी उसकी कुछ गालियों ने उसे ऐसा स्टार बनाया कि न जाने कितने विज्ञापन उसे मिल गए यहां तक कि पुलिस की गाड़ी को एक हाथ से रोकने वाला उसका फोटो भी खाली गाड़ी के आगे किया गया फोटोशूट ही था लेकिन पेश इस तरह कर दिया गया मानो उसने कोई विद्रोह की नई परिभाषा लिख डाली हो। यदि वाकई ऐसी कोई कोचिंग खुली तो वहां इस बात की आपत्ति का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा कि लड़कियां वो गालियां ही क्यों दे रही हैं जो उन्हीं की लैंगिंक अस्मिता के खिलाफ है यानी नई गालियों के लिए सिलेबस बनाए जाएंगे, बताया जाएगा कि कैसे एक एक वाक्य में अधिकतम गालियां भरी जा सकती हैं जो मौके के हिसाब से और थोड़े मॉडिफिकेशन के साथ इस्तेमाल की जा सकें। गालियों सिखाने का ऐसा कोई स्टार्ट अप बस आता ही होगा यदि आपको पता चले तो बताइएगा जरुर क्योंकि एडमिशन मुझे भी लेना है और मुझ जैसे कई और भी हैं जो अब तक गालियों से परहेज करते रहे हैं लेकिन अब आंख खुल गई हैं और कहते हैं जब जागे तभी सवेरा।
