Zen Z दिपके एंड कंपनी ही नहीं ये भी हैं, बशर्ते आप देखना चाहें
–आदित्य पांडे जंतर मंतर पर सेना को गालियां देने वाली जेन जी की झलक आपको खूब दिखाई गई अब यहां सेना में शामिल होने के लिए पहुंच रही जेन जी से मिलिए
‘जेन जी’ का एक रुप वह जो आपको नेशनल मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में अनथक तरीके से दिखाया गया लेकिन इसी जेन जी का एक दूसरा पहलू भी देखना हो तो हमारे साथ नीलबड़ से बिशनखेड़ी के उस रास्ते पर चलिए जहां बन रही शूटिंग एकेडमी के सामने बने स्टेडियम के आसपास सड़क किनारे के आरसीसी कवर स्लैब पर सोते हुए कुछ युवा मिलेंगे तो कुछ हाथ में फल लिए कंधे पर पिट्ठू बैग टांगे दिखेंगे और यह संख्या रात होते होते सैकड़े तक पहुंच जाती है। यदि सेना पर पत्थर चलाती और भद्दी गालियां बकती एक पीढ़ी का एक रुप आपके सामने रखा गया है तो उसका दूसरा रुप देखने आप खुद आठ अगस्त से पहले किसी शाम इधर टहल आइये। रात में सड़क किनारे सोती हुई, केले और चार सेब के दम पर रात तीन बजे सोलह सौ मीटर की दौड़ की तैयारी करती हुई वही पीढ़ी दिखेगी। ये वो हैं जो सेना में भर्ती के अभियान में लिखित परीक्षा पास कर आए हैं और अब उनका फिजिकल टेस्ट होना है। फिजिकल और मेडिकल के बाद इनके लिए वह दरवाजा खुल जाने की उम्मीद है जहां भारतीय सेना इनके लिए दरवाजे खोल देगी। आपने यदि जंतर मंतर पर सेना के जवानों और पुलिस वालों को भद्दे कमेंट करने वाली जेन जी की झलक देखी है तो एक बार आपका इन्हें भी पहचानना बनता है। मदन अहिरवार हैं, फरवरी में जब इसकी वेकेंसी निकली थी तब से लिखित परीक्षा की तैयारी में जुटे थे। उसमें पास हुए तो अब तीन दिन से यहां भोपाल में डेरा है। एक दिन तीन दूसरे उम्मीदवारों के साथ होटल में रुके, एक दिन किसी परिचित के यहां और आज किसी सस्ते से रैन बसेरे की तलाश में हैं लेकिन बिशनखेड़ी, जहां ये भर्ती का सेंटर है उसके दो किलोमीटर दायरे में सस्ती होटल तो क्या बिस्कुट के दो पैकेट भी मिल जाना बड़ी बात है। मदन लिखित के बाद दौड़ में भी ठीक रहे लेकिन अब आंख और कान की क्षमता वाले टेस्ट पर रिव्यू मांगा गया है। पता नहीं क्या होगा। अब मिलिए अभिषेक कदम से, सड़क किनारे ही रात बिताने का इरादा है। होशंगाबाद यानी नर्मदापुरम से हैं, पन्नी में जो एक दर्जन भर केले हैं इनके भरोसे शाम, रात भी काटनी है और सुबह दौड़ भी इन्हीं के दम पर लगानी है। पानी भी सोच समझ कर पीना है क्योंकि भर्ती के लिए जब अंदर जाएंगे तब तो पानी मिल भी जाए लेकिन दौड़ तो रात में तीन बजे होनी है और आप अपने साथ कितने लीटर पानी की बोतल लेकर चल लेंगे। राहुल पटेल भी उन्हीं के शहर से हैं।

गूगल मैप पर तलाश रहे हैं कि जिस सस्ती होटल का पता मिला था उसके लिए दाएं जाना है या बाएं और नेटवर्क है कि साथ नहीं दे रहा है। पीठ पर टंगे बैग में एक जोड़ी कपड़े के अलावा बस उतना ही सामान है जो दो दिन यहां जैसे तैसे गुजारने के लिए पर्याप्त हो। जिनसे आप मिल रहे हैं वो सब बानगी भर हैं क्योंकि जुलाई अंत से शुरु हुई इस भर्ती रैली में आठ अगस्त तक हजारों वो युवा आएंगे जो सेना में जाने के लिए महीनों से तैयारी कर रहे हैं बल्कि कुछ तो वो चेहरे भी हैं जो पिछली भर्ती रैली में भी थे लेकिन सफल नहीं हुए तो एक बार फिर खुद को आजमाने के लिए मैदान में हैं। स्टेडियम के अंदर सेना की वह टीम बैठी है जो न सिर्फ इन भावी सैनिकों के भविष्रू की इबारत लिखेगी बल्कि वो भी जो सख्ती से एक सेंटीमीटर भी कम ऊंचाई या सीने की चौड़ाई पर अभ्यर्थी को बाहर का रास्ता दिखा देगी। अंदर पानी वगैरह की तो व्यवस्था है लेकिन ऐसी भी नहीं कि नब्बे नब्बे के बैच वाले पांच- छह सौ युवकों के लिए पर्याप्त हो। इन उनींदी लेकिन सेना में जाने के सपनों से भरी आंखों वाले जो नौजवान आरसीसी कवर स्लैब पर अपनी रातें गुजार रहे हैं वो अकेले यहां नहीं आए हैं बल्कि अपने परिवार के सपने भी साथ लाए हैं। कुछ ही ऐसे हैं जिनके पालक उनके साथ यहां हैं वरना यह युवा वर्ग अपने बलबूते, अपने संघर्षों के साथ और तमाम नकारात्मकता को दरकिनार करते हुए यहां मौजूद हैं। संभव हो तो बस एक बार शाम के झुटपुटे से लेकर रात के तीन बजे तक वाली गहमा गहमी के बीच कभी भी सिर्फ यह देखने आइये कि कैसे जेन जी का एक बड़ा हिस्सा यह भी है और सिर्फ वही नहीं जिस जेन जी की गालीबाजी को नेशनल मीडिया चौबीसों घंटे सिर्फ इसलिए दिखाता है क्योंकि दिल्ली का प्रदर्शन उसे सुभीते का पड़ता है। अलख हैं, बड़ी उम्मीदें लिए बैठे हैं। आज की दौड़, मेडिकल और सिलेक्शन हो जाए तो कम से कम पच्चीस हजार रुपए महीने तो तय हो जाएं जो घर के लिए बहुत बड़ी रकम होगी, यदि आप रुचिका, विजेता या दिपके के नाम पिछले दिनों जाप की तरह सुन रहे हैं तो इनके नाम के लिए कहीं गुंजाइश भी नहीं बनती लेकिन कंधे के बैग, हाथ की थैली में मौजूद आलू टमाटर के दम पर वो उस दरवाजे को फिर खटखटाने आए हैं जो पिछली बार उनके लिए मानक के हिसाब से जरा सी चूक के चलते बंद हो गया था। सुबह तीन बजे दौड़ना हो तो रात के दो बजे से वॉर्म अप तो जरुरी होता ही है लेकिन उसके पहले महीनों का वार्मअप इस बात के लिए भी जरुरी होता है कि आप इस दरवाजे तक आ भी सकें। नहीं पता कि इस भर्ती रैली से कितने नए रंगरुट, कितने जवान और कितने सैनिक भर्ती होने वाले हैं लेकिन यह तो समझा ही जा सकता है कि कई युवा सपनों को धरातल यहां से मिलने वाला है और कुछ के लिए यहां के रास्ते बंद हो भी रहे तो इस बात का मलाल तो नहीं रहेगा कि देश के लिए खुद को प्रस्तुत करने की दौड़ में तो हम कतई पीछे नहीं थे।


