Twisha Case के बाद तो समझें गलत को गलत कहने के साहस की जरूरत….
आलेख –स्मृति आदित्य
ट्विशा, दीपिका या अमन… सिर्फ नाम नहीं ये वो इंसान थे जो इंसानों की दुनिया में इंसान कहे जाने वाले लोगों के बीच रहते थे और उन्हीं के द्वारा मौत के द्वार तक पहुंचा दिए गए…
बात सिर्फ उस आत्मा की करते हैं जो अब स्मृति शेष हैं…
जिन्दा रिश्तेदार क्या कह रहे हैं कैसे कह रहे हैं से थोड़ा अलग हम उस खत्म होते व्यक्ति पर बात करते हैं…
सिर्फ 5 महीने की शादी और इंसान को जाँचने परखने के कितने कितने मीटर कितने पैमाने सुई की नोक से निकाल लेना ही शेष था बस…
एक इंसान को आपकी ज़मीन से जुड़ने तो दो यार… वह भी पौधा ही थीं उसे कहीं से उखाड़ कर अपने घर में रोपा है तो खाद पानी ऑक्सीजन तो दो… पौधे को पानी देने से ज्यादा जरुरी था उसे पोषण और प्यार देना जिसे आपके आँगन में जड़ पकड़नी है… आपके वंश का फल देना है… हद्द है 60 साल से अधिक की उम्र में आप में धीरज नहीं है पर उसे सब सहन करना आना चाहिए था…
दीपिका, ट्विशा, अमन जैसे हजारों हजार नाम परिवार की शांति, समाज की सोच और परिवार के सहयोग के बिना मर रहे हैं हर रोज…
कहीं तेजतर्रार परिवार हो सकता है तो यक़ीनन कहीं पर खुले विचारों वाली लड़की भी हो सकती है … लेकिन क्या किसी के जीवन की डोर काट देना समाधान है या अगर पीड़ित है तो मर जाना इलाज है…
क्या हमें नहीं पता कि कितने कितने स्तरों पर एक नव ब्याही लड़की को नापा तौला जाता है… ट्विशा सही या गिरिबाला… दीपिका सही या ससुराल वाले.. अमन सही या उसकी बीवी-बहन?
हम कौन हैं फैसला लेने वाले? समाज?
समाज हैं तो फिर सामाजिक दायित्व पहले तय हो फिर तय होंगे समाज के सवाल पूछने के अधिकार…
समाज को स्वस्थ और सकारात्मक सोच वाला हम सबको मिलकर बनाना है…
अगर हमारी लड़की है तो हम चिंतित होकर लड़की वालों की तरफ खड़े हैं और अगर हमारा लड़का है तो हम लड़कों के परिवार का सोच कर पिघल रहे हैं…
हम सही गलत को पहचान कर उसकी तरफ क्यों नहीं खड़े हैं जिसे समाज के साथ की जरुरत है..
गांव और छोटे शहर के आंकड़े जितने भयावह हैं उतने ही डरावने बड़े शहर और विदेशों में ब्याही लड़कियों के मरने और मारने के आंकड़े भी …
लड़कियां मारी जा रही हैं आज भी तरीके बदल गए हैं ‘सलीके’ बदल गए हैं और आज का सच यह है कि लड़के भी मर रहे हैं ऐसे नहीं तो वैसे.. दम उनका भी घुट रहा है… हम उनके लिए भी हर बार उतनी ही बुलंदी से न्याय मांगें…
न जाने कितनी लड़कियों के मायके नहीं हैं उनकी तरफ से दो लफ्ज़ बोलने वाला कोई नहीं है न उनके जीते जी न उनके मरने या मार दिए जाने के बाद भी… बहन – बेटियां जिस समाज में सिर के बाल की तरह ट्रीट की जाती है कि (सिर से झड़ने के बाद यानी शादी के बाद कूड़े में जाएं या करकट में..) Who care…??? वहां यह उम्मीद सिरे से बेमानी है कि कोई उसे जीवन भर घर में रखकर पालेगा…
लड़की को अपने वजूद, अपने व्यक्तित्व, अपनी गरिमा,अपनी अस्मिता के लिए खड़ा होना सिखाइए न… गलत को गलत बोलना भी बताइए और उसे इतनी मजबूती दीजिए कि वह आपकी भी मुखापेक्षी न रहे…
परिवार तब तक परिवार है जब तक दिलों में प्यार है अगर नफा नुकसान व्यापार… भेदभाव की बातें वहां हिलोरे लेती हैं तो संभल जाइए…
…
बात ट्विशा और दीपिका के बहाने हर मासूम युवा को बचाने की करिए चाहे वह अमन की तरह छला गया युवक ही क्यों न हो… चाहे काम के बोझ से टूटती बिखरती दीपिका हो या तथाकथित ‘सभ्य’ लोगों की कुंठा का शिकार होती ट्विशा..
मौत इस तरह कभी किसी बेटी या बेटे को न निगले कि रहस्यमय काले कड़वे कसैले सच उजागर न हो सके…
टूट जाएं वे सारे हाथ जो कभी किसी की बेटी पर उठे..गल जाए वह जुबान जो सिर्फ ताना मारने के लिए खुले… सड़ जाए वह सारी अंगुलियां जो किसी गर्दन को दबाने की तरफ बढ़े…
जाहिर है यह सिर्फ आक्रोश है… हमें बेटी हो या बेटे उन्हें अपनी जिंदगी सही राह पर चलते हुए जीने की परवरिश दें… सही लोग और सही सोच की कद्र करना सिखाएं और गलत लोग, गलत सोच का मुंह तोड़ जवाब देना भी बताएं… उन्हें दलदल से निकलने में सक्षम बनाएं…
बेटी हो या बेटा… जीवन जीने की कला…दुनिया से निपटने की कला सिखाएं…. परिवार के बच्चों को संवेदनशील तो बनाएँ पर भावनात्मक रूप से किसी पर भी निर्भर न बनाएँ….अपने आपका सम्मान पहली और अनिवार्य शर्त है… यह शर्त कल भी जरुरी थीं आज भी जरुरी है…
बदलते जमाने में किसी गिरिबाला को कोई हक़ नहीं कि वह अपने पौधों को पानी अपनी बहू से दिलवाने का सोचें …
टुच्ची बात है पर इसी ओछी बात से मौत का फंदा तैयार हुआ… हमने इस केस में देखा…
