Gymkhana Delhi खाली करने का फरमान और एक अड्डे का बंद होना
अमेरिका से ‘मनजी’ की कलम से जिमखाना की कहानी
ख़बरों में छाया हुआ है ज़िमखाना क्लब। और शिरिमान जी को याद आता है वो ज़माना जब देहली में रहते हुए इस क्लब में दो दफ़े जाना हुआ था। एक अभिन्न मित्र के रसूखदार स्वर्गीय पिता जी इधर के मेम्बर थे। उसी मित्र की बदौलत कुछ घंटे इस क्लब में बिताये- बैडमिंटन खेल, स्नान किया और भोजन किया।
इस स्थान में केवल रसूखदार लोग- अफसर, आला फ़ौजी , राजनेता और अमीर रईस लोग ही मिलेंगे। आम मिडल क्लास , हस्त चिह्न वाले रसिक बलमा के शब्दों में कहें तो “ कैटल क्लास” इधर घुस भी नहीं सकता। इधर भोजन और सुरा अत्यधिक सस्ती दरों पे उपलब्ध है- इतना सस्ता कि आप शायद यकीन ही ना करें। ऊपर से कमाल ये – नगद पेमेंट नहीं होता। जो कुछ खाया पिया- सब उस मेम्बर के खाते में लिख लिया जाता है जो उधर आया और अपने मेहमानों को लाया है। बिल्कुल पुराने ज़माने की भाँति।
ख़ैर- जिमख़ाना की कहानी भी जान लेना जुरूरी है।
क्लब की स्थापना आज से एक सौ तेरह साल पहले हुई जब अंग्रेज़ों ने देश की राजधानी कलकत्ता से शिफ्ट कर देहली करी। देहली में कोई ऐसा क्लब ना था जो अंग्रेज़ अफ़सरान आदि के लिए मुफ़ीद हो।
लिहाज़ा लुटियंस में पौने तीस एकेड ज़मीन अलॉट हुई और सर हर्बर्ट ने इस क्लब की नींव रखी- वही सर जिन्होंने कानपुर का फेमस इंजीनियरिंग कॉलेज बनाया था। क्लब बना- दारू पीने के स्थान बने- तमाम खेलों के लिए स्थान बना। किंतु स्विमिंग पूल ना था। लिहाज़ा एक लार्ड वेडिंग्टन की बेगम ने बीस हज़ार रुपए दान कर तरणताल बनवाया।
अंग्रेज़ी हुकूमत में इस क्लब में सात एक रजवाड़े थे जिन्होंने इधर निवेश किया और बदले में अंग्रेज़ों ने उन्हें परिवारों को सदैव के लिए सदस्यता प्रदान की। जो आईसीएस लोग परीक्षा पास कर आते, उन्हें इस क्लब में बुला कर भोजन करने की तमीज़ सिखाई जाती, बैडमिंटन स्क्वाश आदि खेलना सिखाया जाता।
किंतु- भारतीय अफ़सरों को इमारत में बैठने की इजाज़त ना थी- केवल अंग्रेज़ लोग बैठ सकते थे। भूरे अफ़सर लॉन में खड़े बैठ सकते थे। उनकी ट्रेनिंग आदि इधर हो जाती।
समय बदला- चच्चा साहब इधर के इंचार्ज बने। खाने के मेनू बदले- दाल के साथ अब भुना मटन परोसा जाना लगा। शराब आदि भी सस्ती सरकारी दामों में मिलने लगी।
आज़ादी से लेके अब तक ये दस्तूर जारी है। इस क्लब में मेम्बरशिप मिलना बेहद कठिन है। जिन्होंने आज से तीस साल पहले फॉर्म भरा था वो लोग आज भी प्रतीक्षा में है। दरअसल – सदस्य जिसे बनाना है- एक कमेटी फैसला करती है। जिसके पिता माँ मेंबर्स है और यदि वो फ़ौत हो जाये तो उनके बच्चों को मिल सकती है- बशर्ते वो भी रसूखदार हो।
खैर- सस्ता भोजन दारू का ये ब्रिटिश काल का अड्डा बंद करवा कर मौजूदा सरकार ने साबित कर दिया कि ये लोग विरासत परंपरा आदि को आगे नहीं बढ़ाना चाहते – ये लोग केवल विध्वंस करना जानते है। अब आने वाली पीढ़ियों को कैसे मालूम चलेगा कि राजधानी में एक जगह हुआ करती थी जिधर तमाम रसूखदार लोग बैठ जाम टकरा कर देश की दुर्दशा पे चर्चा करते थे।
अलविदा जिमख़ाना- अब तो केवल लंदन के जिमख़ाना का आसरा रह गया! आज ख़ुशवंत सिंह की रूह जिमख़ाना के टेनिस कोर्ट में फड़फड़ा रही होगी!
