October 16, 2026
प्रदेश

रंग, संगीत और संवाद के साथ राममय रवींद्र भवन

  • आदित्य पांडे ‘राम के कितने नाम, कितने आयाम‘

रवींद्र भवन भोपाल का सांस्कृतिक पता है और इन दिनों जिस तरह वह राममय है वह अनूठा अंदाज है। यहां संगीत है तो राम धुन के साथ है, बातें हैं तो राम की हैं और यदि रंग हैं तो राम के हैं। कोई थाईलैंड से आकर राम की सर्वव्यापकता बता रहा है तो कोई बता रहा है कि कैसे उसने अयोध्या के कण कण में राम के अस्तित्व को पाया। हर वक्ता के अपने राम, हर वक्ता के राम के अपने आयाम। संगीत की जो शाम को महफिल सजती है उसमें युवा जिस धुन पर पुरुषोत्तम से एकाकार होते हैं वह भी राममय और संवाद व संगीत के बीच एक जोड़ने वाली कड़ी की तरह एक विस्तार है जहां प्रदेशभर के कई युवा कलाकार रंगों से राम कहानी कह रहे हैं। इन कैनवास पर नजर दौड़ाएं तो आपको ‘तपोवनादि गमनं’ से लेकर ‘मृगाकंचनं’ तक और ‘जटायु मरणं’ से लेकर ‘समुद्र तरणं’ तक के हर रंग, रुप और गुण वाले राम मिलेंगे। किसी के लिए राम नीलांबरम हैं तो किसी के लिए उनका अक्स हरे रंग में ज्यादा निखरता है। किसी के लिए राम की वह छवि बड़ी है जिसमें वे हनुमान को कह रहे हों ‘सुन सुत तोहि उरिण मैं नाहीं’ तो किसी के लिए श्रीराम का वह क्षण अंकन के काबिल है जिसमें वे रावण की अमृत नाभि अपने बाण की अग्नि से भस्म कर देते हों। जितने चितेरे और जितने फलक, उतने राम और उतने ही राम के रुप। किसी ने उन्हें एक्रेलिक के साथ उभारा है तो किसी के लिए ऑइल कलर्स से उन्हें बनाना ज्यादा सटीक है। किसी ने उन्हें मिट्‌टी से गढ़ा है तो श्वेत श्याम छवि के लिए महज स्केच वाले राम भी। जब आप इस अनुभव से गुजरते हैं तो महसूस करते हैं कि सबके अपने अपने राम तो होते ही हैं एक ही व्यक्ति के भी अलग अलग समय पर अलग अलग राम होते हैं। अब किसी ने अंगद के पैर को हटाने की कोशिश करते रावण के दरबारी बनाए हों तो उसमें दृश्य में कहीं राम नहीं दिखेंगे लेकिन वहां भी दंभ का नाश करते राम अदृश्य रुप में मौजूद हैं। ‘रामाय’ भी, ‘रामभद्राय’ भी, ‘रामचंद्राय’ भी, ‘रघुनाथ’ भी और ‘सीता या पतये’ तक के हर रुप में तो वो हैं ही लेकिन जिन अंकन में वे सीधे दृष्टिगोचर न होते हों वहां भी वो पूरी शक्ति के साथ मौजूद हैं। इस पूरे अनुभव में रेखांकित करने जैसी बात यह कि यहां आपको ‘जेन जी’ की नजरों में राम क्या और कैसे हैं, इसकी छवि मिल जाती है क्योंकि संगीत से लेकर इन कैनवास तक के गलियारों में सबसे ज्यादा भागीदारी इसी नई पीढ़ी की है। एक पीढ़ी ने राजा रवि वर्मा के बनाए रघुपति की छवि को ही अपने दिल में बसा लिया था या एक पीढ़ी ने ‘रामायण’ के अरुण गोविल में राम के दर्शन कर लिए लेकिन फिर आते हें ऐसे आयोजन जो अपने अंदर के राम को यूं चित्रित कर देने का मौका देते हैं, उन्हें संगीत की धाराओं में बहने का मौका देते हैं या संवाद के जरिए अपने विशिष्ट राम को श्रोताओं के सामने रख देने का मंच देते हैं। वे बताते हैं कि रामकथा किस किस रुप में अब तक कही गई है, राम को किस किस रुप में देख लिया गया है और राम कितने अंदाज में गढ़ दिए गए हैं लेकिन वे प्रतिपल आपके मन के भाव के साथ रुप भी बदल देते हैं। कैसे राम ‘श्रद्धा विश्वास रुपिणौ’ को सार्थक करते हुए हर श्रद्धा, हर विश्वास पर मर्यादा पुरुषोत्तम से ‘सर्वस्वं मे रामचंद्रौ दयालु’ तक की यात्रा पूरी करते हैं। श्यामला हिल्स से उतरती बयार ऐसे ही रवींद्र भवन से होते हुए पूरे प्रदेश-देश को राममय करती रहे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ…