करवा चौथ के बहाने यादों के खजाने
सुन्दरतम अभिव्यक्ति और अनुभूति का अवसर
-स्मृति आदित्य
-करवा चौथ, करक चतुर्थी या चंद्र चौथ के नाम से जाना जाने वाला एक खूबसूरत त्यौहार… बदलते मौसम और तीज पर्व की आहट के बीच एक दमकता दिन… एक स्त्री के सौभाग्य, सुंदरता और समर्पण का पर्व.. इस एक दिन के बहाने कितनी कितनी ही यादें और खुशियां मानस में लहरा उठती है और हर लहर के साथ एक मधुर अहसास जन्म लेता है कि हम भारत में जन्मे हैं इसलिए हमें यह सुन्दरतम अभिव्यक्ति और अनुभूति का अवसर मिला है.
अक्सर इस पर्व के आने से पहले समाज में एक अजीब सा माहौल पनपने लगता है. जोक्स, मीम्स, रील्स और कटाक्ष की धरती पर विषैली सोच लहलहाने लगती है… एक ऐसी सोच जिसमें परिहास नहीं उपहास होता है… दिल की बात नहीं होती बल्कि खिल्ली उड़ाई जाती है… मान और सम्मान के सुंदर दिवस पर यह सोच अपमान के तंज परोसने लगती है.
थोड़ा रुक कर ठहर कर शान्ति से सब्र से सोच कर देखिए न… सोशल मीडिया की ही भाषा में कहूं तो रुको जरा सबर करो…
एक बार अपने अतीत के सौंधे आँगन में सरल भाव से मुड़कर देखिए… खोजिए अपनी दादी, नानी, माँ, चाची, ताई मामी, मौसी, बुआ, भाभी, ननद और इन जैसे हर गहरे रिश्ते को. पूछिए इनसे इनके पहले या किसी भी यादगार करवा चौथ की कहानी…. कितने ही आधुनिक हो जाएं हम, ai से कितनी ही उन्नति की ऊंचाई को स्पर्श कर लें पर इन कहानियों के साथ जो उनके चेहरे की लालिमा, गुलाबी लाज और कान की लवें केसरिया होती दिखेंगीं उससे ज्यादा मधुर अहसास आपको कहीं नहीं मिलेगा…
माना कि अब वे सब पुरानी बातें यादें हैं पर प्रेम??? समर्पण??? रिश्ता??? क्या ये सब भी पुराने होते हैं???
नहीं… मेरी शशि मामी हँसते हुए बताती थी कि पहले करवा चौथ पर उनकी मामाजी से लड़ाई हो गई थी सिर्फ इस बात पर कि उन्होंने पार्लर जाने की अनुमति मांगी थी और वह नहीं मिली उन्हें… शाम को जब सब चंद्र को अर्घ्य दे रहे थे तो मामी ने भी चलनी से चाँद के बाद मामाजी को देखा था और मामाजी ने उन्हें करवा चौथ का उपहार दिया था 12 रुपए की नेलपॉलिश… मामी उस भोलेपन पर रीझ गई थी कि इस मानव से कैसे पंगा किया जाए…
शीतल चन्द्रिका बुआ जी को पहले करवा चौथ पर फूफा जी ने एक पेन लाकर दिया था कि वे अपनी वकालत की डिग्री का फॉर्म भरें.
और मधु भाभी तो आज भी उस दिन को याद कर आँखें सजल कर लेती है कि उनके पति ने उनकी भूख की स्थिति भांप ली और शॉपिंग के बहाने ले जाकर चीकू शेक पिलवा दिया यह कहकर कि मेरी लंबी उम्र तभी तो काम की है जब तुम स्वस्थ रह कर साथ रहोगी… आज तक वे उस पहले करवा चौथ की ऋणी है जिस दिन पति के संवेदनशील ह्रदय का परिचय मिला था.
ये पर्व हमें जोड़ते हैं. थोड़ा और पास लाते हैं. एक दूजे के करीब आने की राह बनाते हैं. थोड़ा रुक कर रिश्तों की नमी बचा लेने का मीठा संदेश देते हैं…
भला उसमें फॅमिनिज्म या वुमनिज्म कहाँ से आता है…??
जिसे व्रत ना करना है ना करें पर इस व्रत की गहन गंभीर गरिमा पर तो आक्रमण न करें.
एक पक्ष जो आजकल उभरा है वह भी कम डरावना नहीं जिसमें महंगे आलिशान होटलों और रिजॉर्ट में भव्य पैमाने पर महँगी मेकअप सज्जा और उससे भी महंगे गहनों की प्रतिस्पर्धा पर आकर नकली चकाचौँध में डूब जाता है.
किस पति ने कितने महंगे तोहफ़े दिए की होड़ में ना जाने कितने मासूम दंपत्ति अपने दिन और रात को स्याह कर लेते हैं…
सच तो यह है कि दोनों ही अतिरंजना है.
हमारी संस्कृति के आँचल में टांके हुए ये त्यौहार हमारे मन को खुश करने आते हैं. मन की शांति इन नश्वर चीजों के लिए क्यों भंग करना…
एक परवाह, एक गुलाब, एक स्पर्श, एक नज़र, एक मुस्कान… एक ईमानदार रिश्ता, एक समर्पण भाव…सच्चे दिल से देकर तो देखिए…
पत्नी को स्नेह, सम्मान और रिश्ते की सुरक्षा से ज्यादा कुछ नहीं चाहिए…
और पत्नी के मानस में भी ये शुभ भाव आ जाए कि यही असली खुशी है तो पति का दायित्व भी बनता है कि वह उसकी खुशी को समझें और वही उपहार भी लाएं जो उसके सपनों में सजा है…
माना की उसने माँगा नहीं पर ऐसा नहीं कि उसने चाहा नहीं…
रिश्तों की मासूमियत पर सोशल मीडिया की कालिमा मत पड़ने दीजिए और अगर ऐसा हो रहा है तो एक दूजे को कहिए – रुको जरा…. सबर करो…
एक मीठी मुस्कान के साथ करवा चौथ मनाइए बदलते वक़्त के साथ जबरन भूखे रहने की कट्टरता और अनावश्यक दिखावा दोनों को बिदा कहिए… सात्विक आहार ले लीजिए कोई बुराई नहीं… रिश्तों की सात्विकता और मिठास ही पर्व का संदेश है… अब तो आप समझ ही गए होंगे…. करवा चौथ पर करीब आना है कड़वे नहीं होना है…
