Melody खाओ खुद जान जाओ पारले प्रोडक्ट्स को
मेलोनी को मेलोडी देकर पीएम मोदी ने सोशल मीडिया में हैाटैग और मीम्स की बाढ़ ला दी है, ऐसे में पारले प्रोडक्ट्स की मेलोडी को भी पहचानें
इटली जाकर वहां की प्रधानमंत्री को मोदी ने मेलोडी चॉकलेट का पैक क्या गिफ्ट किया सोशल मीडिया से लेकर खबरों तक में मेलोडी की धूम मची हुई है। इसे बनाने वाली कंपनी पारले को लेकर ऐसा कुछ हुआ कि लोगों ने पारले इंडस्ट्रीज नाम की कंपनी के शेयर खरीद डाले क्योंकि उन्हें लगा इतनी बड़ी ब्रांडिंग के बाद तो मेलोडी वाली पारले के दिन चमकना ही है। जमकर खरीदी हुई और शेयर सर्किट तक पहुंच गया लेकिन बाद में पता चला कि जिस कंपनी के शेयर उन्होंने खरीदे हैं वो तो पारले प्रोडक्ट्स वाली यानी मेलोडी वाली कंपनी है ही नहीं। इसलिए चलिए जानते हैं मेलोडी चॉकलेटी टॉफी और उसे बनाने वाली पारले कंपनी के बारे में।
स्वदेशी आंदोलन के समय यानी 1925 के आसपास गुजरात के वलसाड के एक युवक ने मुंबई का रुख किया। नाम था मोहनलाल दयाल चौहान था। आयातित मिठाइयों और बिस्किट की जगह उन्होंने पूरी तरह अलग सा मीठा बनाने की चाह में उन्होंने जर्मनी की यात्रा की और वापस आकर विले पार्ले में एक झोपड़ी से कुछ बेहतर एक फैक्ट्री जैसी जगह ली। 12 कर्मचारियों के साथ और कुछ जर्मन मशीनें लगाकर हाउस ऑफ पार्ले की शुरुआत हुई। साधारण पारंपरिक भारतीय मिठाइयों के साथ उन्होंने टॉफियों पर भी हाथ आजमाया। 1939 में उन्होंने पारले ग्लूको के नाम से बिस्किट बनाने शुरु किए जिनका नाम बाद में पारले जी कर दिया गया और आज ये घर घर में मौजूद होते हैं। उनकी आने वाली पीढ़ियों ने व्यवसाय को पूरी तरह बिस्किट जैसी चीजों पर फोकस किया। 1983 में पारले ने हर बच्चे की खुशी और कम खर्च का ध्यान रखते हुए मेलोडी नाम से एक टू इन वन टॉफी बनाई। इसमें नरम, चबाने योग्य कारमेल की बाहरी परत और अंदर चॉकलेट होती थी। चॉकलेट का यह सुलभ और सस्ता स्वाद लोगों को बेहद पसंद आया। इसकी मार्केटिंग भी बेजोड़ तरीके से की गई। क्रिएटिव हरेश मूरजानी और कॉपीराइटर सुलेखा बाजपेयी ने चुटीला सा कैंपेन बनाया। जिसमें जिंगल में सवाल आता है, “मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?”…और इसका मज़ाकिया जवाब: बड़ी ही प्यारी सी धुन के साथ आता है मेलोडी खाओ खुद जान जाओ। हर किराना स्टोर में कांच के जार से लेकर रैपर पर लगे स्टिकर तक, मेलोडी भारतीय बच्चों के जन्मदिन, बरसात के दिनों, स्कूल की छुट्टियों और यादगार टॉफी के टुकड़ों का अभिन्न अंग बन गई। पारले आज भी इसे पूरे प्यार से बनाता है और पारले के ऐसे ब्रांड उसे भारतीय उद्यमशीलता के इतिहास, स्वदेशी भावना और बचपन के जादुई एहसास का एक हिस्सा बनाते हैं।
