Relationship जिसमें संतुलन बनाना सबसे जरुरी है
बहू को बेटी भले न मानें लेकिन इंसान तो मानें
लेखिका– कुक्कू द्विवेदी
परिवार ऐसा होना चाहिए जहाँ आकर शांति, सुख और संतोष मिले। विडंबना यह है कि अक्सर परिवार में ही लोग एक-दूसरे को सही तरह से समझ नहीं पाते।
जब एक परिवार में दूसरा परिवार जुड़ता है, तो लड़की एक अलग परिवेश में पली-बढ़ी होती है और लड़का अलग माहौल में। अगर दोनों के बीच एक-दूसरे के लिए स्वीकार्यता और प्रेम हो, तो वे एक-दूसरे की अच्छाइयों और कमियों सहित एक-दूसरे को अपना लेते हैं। जब पति-पत्नी का रिश्ता मजबूत होता है, तो तीसरा व्यक्ति उसे आसानी से प्रभावित नहीं कर सकता।
आजकल लड़कियों की शादी देर से होती है। उनका अपना व्यक्तित्व और अस्तित्व होता है, और वे अपने अधिकारों के प्रति भी सजग रहती हैं। इसलिए पहले की तरह उन्हें पूरी तरह बदल देना संभव नहीं है। ससुराल वालों की भी बहू से अपेक्षाएँ कम होनी चाहिए और उसे समय देना चाहिए, ताकि वह घर और परिवार के लोगों को समझ सके।
बहू को बेटी मानो या न मानो, लेकिन सबसे पहले उसे एक इंसान तो मानो।
साथ ही लड़कियों को भी यह समझना होगा कि बेटा अपनी माँ को एकदम से छोड़ नहीं पाता। उसकी माँ को उससे अलग करके कोई रिश्ता मजबूत नहीं बन सकता। बेटे को भी माँ और पत्नी के बीच संतुलन बनाना आना चाहिए।
रिश्तों से पहले एक इंसान के रूप में एक-दूसरे को समझना और देखना बहुत ज़रूरी है।
और जहाँ तक समाज की बात है — आखिर किस समाज के लिए सब कुछ सहा जाए? अगर किसी रिश्ते में लगातार अशांति और दुख हो, तो शांति से अलग हो जाना कई बार बेहतर होता है।
अपनी समस्याएँ सही व्यक्ति से साझा करना भी बहुत ज़रूरी है। चाहे लड़का हो या लड़की, किसी को भी अत्याचार नहीं सहना चाहिए। समझौता करना ठीक है, लेकिन केवल वहीं तक जहाँ आत्मसम्मान और मानसिक शांति बनी रहे। समस्या का सामना करना चाहिए!आत्महत्या करना और हत्या करना तो जघन्य अपराध है.
