Nepal त्रासदी के बाद सरकार का नियंत्रण पड़ रहा भारी
अज्ञात बताकार शवों को दफनाया जा रहा है जबकि हिंदूवादियों का कहना है कि यह परंपराओं का उल्लंघन
नेपाल में बाढ़ से मरने वालों की संख्या अब सरकारी आंकड़ों में ही में अब तक 903 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। ज्यादातर शव बहने की जगह से दूर निचले इलाकों में मिल रहे हैं, चूंकि जमीनी हकीकत सामने न आ सके इसलिए नेपाल सरकार ने मीडिया पर कई सारे प्रतिबंध लगा दिए हैं इसलिए सिर्फ सरकारी आंकड़े ही मौजूद हैं जबकि हकीकत में मृतक संख्या कई गुना ज्यादा बताई जा रही है। यही हाल गुम हुए लोगों की संख्या का भी है जिस पर विवाद है। इस बीच नेपाल के चितवन जिले में बिना पहचाने शवों को अस्थायी कब्रों में दफनाए जाने पर भी विरोध शुरु हो गया है। लोगों का कहना है कि सरकार इस तरह मृतकों को दफन कर हिंदू अंतिम संस्कार की परंपराओं की अनदेखी कर रही है। दरअसल सरकार वास्तविक संख्या सामने रखने से बचने की पूरी कोशिश कर रही है, यहां तक कि विदेशी सहायता लेने से मना करने के पीछे भी यही कारण माना जा रहा है कि कहीं मदद करने वाले जमीनी हकीकत न समझ लें। यही वजह है कि अब कब्र बनाने के लिए खोदे गए गड्ढों से मृतकों की संख्या का अनुमान लगाया जा रहा है और अकेले चितवन में यदि 250 के करीब शव मिलते हैं तो समझा जा सकता है कि मृतक संख्या कितनी ज्यादा है। सरकार ने मृतकों दफनाने के पीछे तर्क दिया है कि डीएनए, तस्वीरें और निशान लेकर एक नंबर भी दिया जा रहा है ताकि बाद में मृतकों के परिजन उन्हें निकाल कर ले जा सकें। सरकार का कहना है कि सड़ने से बचाने के लिए शवों को दफनाना जरूरी था वरना बीमारी फैलने का डर था वहीं इस कदम का विरोध करने वालों का कहना है कि मृतकों का सम्मान से अंतिम संस्कार किया जा सकता है। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने भी अज्ञात शवों को दफनाने के निर्णय का विरोध किया है उनका कहना है कि आपातकालीन संसाधनों के साथ शीत भंडारण सुविधाएं बनाकर शवों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
