July 8, 2026
Film

Satluj कहानी ही दिखानी है तो पूरी कहानी दिखाइये, पूरी बात बताइये

उग्रवाद के दौर के पुराने जख्म उधेड़ने जरुरी ही थे तो उग्रवादियों के हाथों मारे गए लोगों की मौत का भी हिसाब दिया जाना चाहिए

दिलजीत दोसांझ के अभिनय वाली सतलज फिल्म को लेकर जो हंगामा मचा है उसे थोड़ा करीब से समझिए। सबसे पहले तो यहीं से शुरु करें कि यह फिल्म ओटीटी पर क्यों रिलीज की गई। जब आपकी फिल्म लंबे समय तक अटकी रहे और उसमें सेंसर को सौ से भी कहीं ज्यादा कट लगाने की जरुरत महसूस हो तो समझा जा सकता है कि मामला गड़बड़ है लेकिन इसे बनाने वाले ठहरे ड़ेढ़ सयाने, उन्होंने ओटीटी के लिए मौजूद लचर कानूनों और इनके अब तक पूरी तरह साफ न होने का फायदा उठाते हुए इसे ओटीटी पर जारी कर दिया लेकिन ऐसा भी नहीं कि ओटीटी पर कंटेंट को लेकर कोई नियम ही नहीं है, इसलिए जी फाइव ने इसे दो दिन से भी कम समय में हटा भी दिया। दरअसल फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है जो पंजाब में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद चले खतरनाक आतंक के दौर की बात करती है जब केपीएस गिल जैसे बंदे को पंजाब से इस आतंक को हटाने की जिम्मेदारी दी गई थी और साथ ही फ्री हैंड भी दिया गया था। गिल ने देश की सुरक्षा के चलते पुलिस की वर्दी में रहते जितना कर सकते थे उससे कहीं ज्यादा करने का इरादा किया था। ऐसे में एक बैंक कर्मी सारे काम काज छोड़कर श्मशान में लकड़ियों का हिसाब लगाने का काम शुरु करता है और अंदाजन यह बताता है कि दो हजार के करीब लोग ऐसे रहे होंगे जिनका पुलिस में मौत का रिकॉर्ड नहीं है लेकिन वो पुलिस के हाथों मारे गए हैं। इन्हीं सज्जन की कहानी दिलजीत की फिल्म कह रही है, समझिए कि पंजाब में दशकों तक चले उग्रवाद में लगभग 22 से 25 हजार लोग मारे गए लेकिन उन पर फिल्म बनाने की किसी को फुरसत नहीं है। यदि मान भी लें कि कुछ लोग ऐसे मारे गए जिनकी भूमिका कानून की नजर में भले संदिग्ध नहीं रही हो लेकिन हिंसा में वे शामिल होने की शंका से परे नहीं थे। तो ऐसे लोगों की मौत पर एक ऐसी फिल्म बना दी जाएगी जो एक मर चुके हिंसक दौर को फिर जगा दे, जो खालिस्तान के समर्थन का दबी जुबान में ही सही समर्थन करती हुई सी लगे या कि जो एक प्रधानमंत्री की हत्या को भी प्रकारांतर से उचित ठीक ठहराती हो, जो एक चुने हुए मुख्यमंत्री के मारे जाने वाले दृश्य में पीछे खुशी का गाना बजते हुए दृश्य लिए हुए हो। दरअसल जब से खालिस्तान आंदोलन कनाडा से ऑपरेट होने लगा है तभी से खुद को अलग दिखाने की जिद, पुराने मामलों को नए सिरे से उभार कर नए नैरेटिव गढ़ने का खेल और खालिस्तान समर्थकों को अलग अलग अंदाज में पेश करते हुए बेस बड़ा करने की नीति अपनाई जा रही है और इसमें पैसे की कहीं कोई कमी नहीं है। इसमें एक फैक्टर यह भी जोड़ लीजिए कि आम आदमी पार्टी के चीफ पर अब तक जो आरोप लगे हैं उनमें एक खालिस्तानी के घर रुकने से लेकर इस मामले पर रुख साफ न रखने तक के आरोप भी हैं और यही पार्टी अभी पंजाब में सत्ता पर भी काबिज है। दरअसल फिल्म को लेकर चंद आंदोलनजीवियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाला मुद्दा देकर भड़का कर खड़ा कर दिए जाने की कोशिश है ताकि न सिर्फ पुराने मामलों पर बहस हो बल्कि इस फिल्म को लेकर उत्सुकता बढ़े और ज्यादा लोगों तक इसका इंपेक्ट पहुंचे। दिलजीत दोसांझ की एक शाम के लिए जब मैंने अपने शहर में तामझाम होते देखे तो लगा मामला गड़बड़ है, जब टिकट की दरें देखीं तो लगा कि हमें लोगों को परखने की समझ शायद नहीं है, उनके कुछ बयान देखे तो लगा कि इस बंदे के साथ कहीं कोई अद्श्य बड़ा सपोर्ट सिस्टम है, जब पाकिस्तान के प्रति इसका प्रेम देखा तो लगा कि शंका तो करनी चाहिए और जब इस तरह की फिल्म में उसके संकेत देखे तो लगा कि यह तो पूरी दाल ही काली है। केपीएस गिल ने एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल हत्याएं करवाई या नहीं यह मुद्दा ही संदेह के घेरे में है और यदि कराई भी तो यह कितनी उचित कितनी अनुचित थीं इस बात पर भी बहस हो सकती है क्योंकि जब सवाल देश की टूटन तक पहुंच रहा हो तो कानूनन सभी काम करने का मुंह तकते रहना भी सही नहीं होता। सतलज चूंकि सिर्फ ओटीटी प्लेटफॉर्म से भारत में हटी है इसलिए बाकी जगहों पर यह देखी ही जा रही है और ऐसा भी नहीं कि देखने वाले भारत में इसे अलग तरीके से नहीं देख पा रहे हों यानी एक ऐसी फिल्म जिसका सेंसर से पास हो पाना लगभग नामुमकिन था उसे बिना प्रस्तावित कट लगाए इसलिए ओटीटी पर लाया गया ताकि इसके जरिए हंगामा खड़ा किया जा सके और फिर जब लगा कि ओटीटी पर भी कुछ तो कानून लागू होते ही हैं जिन्हें भी इस फिल्म को अपलोउ करना पुरा नहीं करता तो इसे हटा लिया गया, इसमें सरकार या सेंसर बोर्ड अभी तक तो कहीं बीच में नहीं है। हालांकि जरुरी यह था कि सरकार का इसमें सीधा दखल होता और यदि लगता है कि ऐसी फिल्म किसी भी तरह से भड़काऊ है तो उसे किसी भी सूरत में किसी भी प्लेटफॉर्म पर उतारे जाने की अनुमति ही नहीं मिलनी चाहिए थी। दरअसल सतलज ने दो चीजें बहुत साफ कर दी हैं, पहली तो यही कि हमारे सेंसर बोर्ड और ओटीटी जैसे प्लेटफॉर्म के रेगुलेशन कड़े करने ही होंगे और दूसरी बात यह भी कि कलाकार के नाम पर भी कुछ लोग प्रोजेक्ट तो नहीं किए जा रहे हैं इस पर भी नजर रखी जाए।