TCS Nashik Case: मामला दर्ज होने से रोकने और खबरें दबाने के आरोप
धर्म परिवर्तन करवाने के लिए टीसीएस ने जिस तरह की सुविधाएं जिहादियों को दीं उस पर भी उठने चाहिए सवाल
टीसीएस के नासिक कैंपस में जो बात सामने आई है वह यह है कि बाकायदा सिंडिकेट बनाकर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा था और टीसीएस का नाम इन कथित मैनेजरों के पास ब्लैकमेल करने का बड़ा हथियार ही नहीं था बल्कि उन्हें इस बात की भी बेफिक्री थी कि बात पुलिस तक नहीं पहुंचेगी और मामला कंपनी संभाल लेगी। हुआ भी ठीक यही, पहले तो कंपनी ने ऐसा सिंडिकेट खड़ा होने दिया जिसमें एचआर चीफ भी शामिल थी। इसके बाद माहौल ऐसा बनाया गया कि कोई शिकायत ही न कर सके और धर्म के नाम पर उत्पीड़न को कंपनी की पॉलिसी ही मान लिया जाए। यदि किसी ने शिकायत की भी तो न एचआर सुनने वाला है और न कंपनी की वह विंग जिसे कर्मचारियों की शिकायतों पर एक्शन लेना होता है। जब एक लड़की ने समझौता नहीं किया और पुलिस ने उसकी शिकायत पर सबूत वगैरह जुटा भी लिए तो टीसीएस ने पूरी ताकत इस बात के लिए लगाई कि जैसे भी हो मामला दर्ज न हो। जाहिर है यह बात सिर्फ उस सिंडिकेट की ही नहीं है जिसने टीसीएस कैंपस में जिहाद चला रखा था बल्कि बात ऊपर तक की है। आखिर कंपनी को क्या पड़ी थी कि वो अपनी ताकत इस बात में लगाए कि मामला दर्ज होने से रुक जाए। इससे भी आगे जब बात खुल ही गई तो टीसीएस ने भले ऊपरी तौर पर कह दिया हो कि हमने आरोपी कर्मचारियों को निकाल दिया है लेकिन पीछे से खेल यह किया कि सभी बड़े मीडिया संस्थानों को यह बात साफ कर दी गई कि आपको टाटा से विज्ञापन चाहिए तो किसी भी हालत में या तो मामले को छापा ही न जाए और यदि बेहद जरुरी हो तो कम से कम टीसीएस का नाम न छपे। अकेले टीसीएस ही विज्ञापन रोकने की धमकी दे दे तो कुछ संस्थान उनके सामने रेंगने लग जाएं और यदि बात पूरे टाटा ग्रुप से मिलने वाले विज्ञापनों की आ जाए तो मजाल है कि ये एक भी शब्द छाप दें। यही वजह है कि सच्ची बात बेधड़क कहने का दम भरने वालों से लेकर कई संस्थानों ने इस खबर के साथ ऐसा बर्ताव किया जैसे कुछ हुआ ही न हो। वैसे इसके पीछे इनकी मानसिकता भी है, खुद इन संस्थानों में आप किसी विशेष वर्ग को मिलने वाले विशिष्ट व्यवहार को देख लें तो आप समझ जाएंगे कि इनके हाथ ऐसी खबरें लिखने में क्यों कांप जाते हैं। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि अखबार की किसी डेडलाइन के समय में भी कोई एक घंटे इबादत के नाम पर जाना चाहे तो पूरी छूट मिल जाती है लेकिन मजाल है कि किसी को पूजा या हवन या किसी धार्मिक वजह से दो घंटे की भी छूट मिल सके। आप जिस मीडिया संस्थान पर भरोसा करते हैं उसे इस कसौटी पर जरुर परख कर देख लें कि उसने इतने खतरनाक इरादे वाले मामले को किस तरह से आपके सामने पेश किया है और कितनी तो छोड़िए, जगह दी भी है या नहीं।
