September 8, 2026
देश दुनिया

Zen Z Term और नेपाल के बाद एक साल

आदित्य पांडे भारतीय मीडिया में इस शब्द युग्म का इतना ज्यादा प्रचलन किसी बड़ी दरार पैदा करने के लिए तो नहीं किया जा रहा

नेपाल में हुए हंगामे के बाद जब सुबह हिंदी अखबार में नया शब्द का जोड़ा देखा तभी चौंका था क्योंकि श्रीलंका में हुए हंगामे के बाद भी उसे अखबारों ने जेन जी नहीं लिखा था लेकिन नेपाल के समय तक कहीं से यह आदेश ही आ गया हो कि अब सभी जगह जेन जी टर्म को इतना चलन में ला देना है कि आगे कि पूरी रणनीति इसी पर बनाई जा सके। बड़े अखबार सोरोस एंड कंपनी की तरफ से आए निर्देशों को ठीक वैसे ही स्वीकार करती है जैसे पुराने जमाने में कभी आकाश से गूंजने वाली देववाणी पर किया जाता था। इसके बाद तो जेन जी शब्द युग्म को इस कदर इस्तेमाल किया जाने लगा मानो यह हमारे समाज और संस्कृति का ही हिस्सा हो जबकि हकीकत यह है कि यह ऐसा देश है जो मैकाले की दी हुई अंग्रेजी पढ़कर बड़ा हुआ है और आज भी देश के निन्यानवे प्रतिशत स्कूलों में ‘जेड़ फॉर जेब्रा’ ही पढ़ाया जाता है। यानी युवा वर्ग को हमारे महान संपादकों ने ही नया और वह भी अंग्रेजी नाम देना होता तो वह ‘जेन जेड’ होता न कि ‘जेन जी’ और ऐसा भी नहीं कि यह ब्रिटिश कॉलोनी बतौर हमारे समाज में घुल मिल गया हो क्योंकि अंग्रेजी वर्णमाला के इस आखिरी अक्षर को अमेरिका में ‘जी’ कहा जाता है। जाहिर है जेन जी इस्तेमाल करने का आदेश अमरिक्का से ही आया। अब एक साल पूरा होते होते आप नजर घुमाइये तो पाएंगे कि यह शब्द युग्म उन जगहों पर भी बेवजह इस्तेमाल किया जाने लगा है जहां इसके लिए कोई संभावना ही नहीं बनती है। दरअसल जो तोड़ने वाली शक्तियां होती हैं उन्हें हर जगह ऐसी ही दरारों की तलाश होती है जिन दरारों को बड़ा कर खाई बनाई जा सके। एक लंबे समय से हम ब्रिटिशर्स की फूट डालो और राज करो नीति के दुष्परिणाम झेल रहे हैं और उनके चले जाने के अस्सी साल बाद भी हमारे लिए सिरदर्द हैं। इस दरमियान ब्रिटेन की ताकत घटी तो अब हमें अमेरिका की इन्हीं फूट डालने वाली हरकतों का सामना करना पड़ रहा है और फूट डालने के तरीके यही होते हैं। जितने सामाजिक ताने बाने हैं उनमें किसी न किसी तरह से ऐसा एजेंडा बैठा देना कि दरार बढ़ती जाए। कहने को जेन जी छज्ञेटा सा टर्म है लेकिन इसने पिछले एक साल में क्या हालात खड़े किए हैं यह देखने नहीं समझने की बात है और ऐसा भी नहीं कि यह दौर एक साल में बीत चला हो बल्कि इसने जोर तो अब पकड़ना शुरु किया है जिसमें फौजियों को गाली देने खड़ी लड़की हो या पुलिस अफसरों के साथ बदतमीजी कर रही भीड़, इनके पास मात्र एक लाइसेंस है कि हम जेन जी हैं। दुनिया की बुनावट में पहले पूरा का पूरा समाज एक साथ हुआ करता था जिसमें हर उम्र, हर लिंग और हर तबके की हिस्सेदारी थी लेकिन फिर उपेक्षाओं का दौर शुरु हुआ और उम्र इसमें एक बड़ी भूमिका निभाने लगी। युवा शक्ति को आगे बढ़ाने के फेर में हमने उम्रदराजों को दरकिनार करना शुरु कर दिया। आज सरकार की किसी भी योजना में सबसे पहली और प्राथमिकता का हिसाब लगाएं तो पाएं कि बुजुर्गों के लिए कुछ भी नहीं है, यहां तक कि जिन्हें पेंशन मिलती है उनकी पेंशन को लेकर भी अक्सर सवाल उठाए जाते हैं, बिना यह याद किए कि इन्होंने भी अपना पूरा यौवन काम के लिए दिया है। मेरे शहर की जब बीआरटीएस की योजना सामने आई तो मेरा एक ही सवाल था कि इसमें बुजुर्ग कैसे यात्रा करेंगे, यह बात अलग है कि यह परियोजना कुछ समय रह कर दम तोड़ गई लेकिन ऐसी किसी भी योजना परियोजना को देख लें तो आप पाएंगे कि इनमें हर जगह प्राथमिकता का आधार जेनरेशन की सबसे युवा फसल ही है। नई पीढ़ी के लिए रास्ते खुलने चाहिए इसमें किसी को दिक्कत नहीं है लेकिन यह बाकी परिवार की कीमत पर नहीं होना चाहिए, जेन जी को साथ मिलना चाहिए लेकिन उन बाकी पीढ़ियों की कीमत पर नहीं जो आबादी का ही हिस्सा हैं और जिनका हक छीनने का मतलब समानता के अधिकार को परे करना है।