May 12, 2026
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“कितना देती है” से “कितना पीती है” तक का भारतीय सफर

  • आलेख – आशुतोष केवलिया
  • सड़को से छोटी कारें गायब, छोटे ट्रक हाजिर !

एक समय था जब भारतीय मध्यमवर्ग की सबसे बड़ी आकांक्षा होती थी कि अपने घर के बाहर एक छोटी-सी कार खड़ी हो। वह कार केवल चौपहिया वाहन नहीं होती थी, बल्कि परिवार के संघर्ष, बचत और सपनों का प्रतीक होती थी। मोहल्ले में अगर किसी के घर लाल-सफेद रंग की मारूति 800 खड़ी दिख जाए तो बच्चे उसे ऐसे निहारते थे जैसे कोई हवाई जहाज कॉलोनी में उतर आया हो।
उस दौर की कारें छोटी थीं, कम पेट्रोल पीती थीं और सबसे बड़ी बात सड़क पर कम जगह घेरती थीं। कार खरीदने वाला पहला सवाल यही पूछता था “कितना देती है?” और डीलर पूरी गंभीरता से उसका जवाब देता था। ज्यादा माइलेज ही कार का चरित्र प्रमाण पत्र हुआ करता था। आज के जेन-जी बच्चों को शायद यह बात मजाक लगे, लेकिन कभी भारत में कार की इज्जत उसके एवरेज से तय होती थी। मारूति 800, फिएट की प्रीमियर पदमिनी जैसी कारें उस दौर की शान हुआ करती थीं।

लेकिन धीरे-धीरे भारत बदल गया है। बाजार बदला, विज्ञापन बदले, आकांक्षाएँ बदलीं और कारों का आकार भी बदल गया। आज सड़क पर निकल जाइए कारें कम, छोटे-छोटे ट्रक ज्यादा दौड़ते दिखाई देते हैं। हर दूसरी गाड़ी ऐसी लगती है मानो अभी किसी पहाड़ी युद्ध क्षेत्र में जाने वाली हो। ऊँची, चौड़ी, भारी। बड़े-बड़े टायर। और ऐसी कि मोहल्ले की गली में मुड़ते वक्त आधी कॉलोनी परेशान हो जाए। जमाना इनको शान से एस.यू.वी. कहता है।

आज कार खरीदते समय यदि आप डीलर से माइलेज पूछ लें तो वह आपको ऐसे देखता है जैसे आपने किसी फाइव स्टार होटल में दाल-रोटी का रेट पूछ लिया हो। उसके चेहरे पर दया, आश्चर्य और उपेक्षा का मिश्रण दिखाई देता है। आजकल चर्चा होती है सनरूफ है या नहीं ? गाड़ी कितनी ऊँची है ? कितनी बड़ी टच स्क्रीन है ? कितने स्पीकर हैं ? कितने एयरबैग हैं ? लेकिन “कितना देती है ?” अब पिछड़ेपन का सवाल माना जाने लगा है।

“कितना देती है” से “कितना पीती है” तक का यह बदलाव केवल ऑटोमोबाइल उद्योग का बदलाव नहीं है, यह भारतीय मानसिकता का बदलाव है। छोटी कार अब जरूरत नहीं, शर्म की चीज बना दी गई है। बड़ी एस.यू.वी. अब केवल वाहन नहीं, व्यक्ति का स्टेटस सिंबल है। आदमी चाहे बैंक लोन की ई.एम.आई. में डूब जाए, लेकिन गाड़ी ऐसी चाहिए कि पड़ोसी की नींद उड़ जाए। घर में पार्किंग हो या न हो, लेकिन कार बड़ी होनी चाहिए। कॉलोनी की सड़क तो है ही पार्किंग के लिए। ज्यादा हुआ तो पड़ौसी के घर के सामने खड़ी कर देंगे। शहरों की तंग गलियों में रहने वाला व्यक्ति भी ऐसी गाड़ी खरीद रहा है जिसे मोड़ने के लिए उसे तीन बार रिवर्स लेना पड़ता है।

देश की सड़कें वही हैं, पार्किंग वही है, ट्रैफिक वही है, लेकिन गाड़ियाँ लगातार विशाल होती जा रही हैं। पहले जहां दो छोटी कारें आराम से निकल जाती थीं, अब एक एस.यू.वी. निकलने में पूरी सड़क जाम कर देती है। महानगरों में हर दिन घंटों ट्रैफिक जाम में फंसने वाले लोग इन सब परेशानियों के बावजूद भी बड़ी कार को अपनी उपलब्धि मानते हैं। गाड़ी जितनी बड़ी, आदमी उतना सफल…यह नया सामाजिक गणित बन चुका है। विडंबना यह भी है कि बड़ी गाड़ी अक्सर बड़े अहंकार के साथ आती है। सड़क पर सबसे ज्यादा हॉर्न, सबसे ज्यादा हेडलाइट फ्लैश और सबसे ज्यादा “साइड दो, पहले मैं निकलूंगा’’ वाली मानसिकता प्रायः इन्हीं विशाल वाहनों में बैठे लोगों में दिखाई देती है। मानो सड़कें चलने के लिए नहीं, शक्ति प्रदर्शन के लिए बनी हों।

दूसरी तरफ माननीय प्रधानमंत्री जी अपील कर रहे हैं कि जहां तक संभव हो पेट्रोल/डीजल का उपयोग कम करें। मेट्रो, इलेक्ट्रिक बस और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग बढ़ाएँ। यह अपील बिल्कुल सही है। प्रदूषण, आयातित तेल पर निर्भरता और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन के दौर में यह समय की आवश्यकता भी है। अब समस्या यह की बड़े बड़े शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट हैं कहाँ? हैं, तो कितने हैं, आरामदायक हैं? अगला सवाल यह है कि क्या केवल मेट्रो और बस से समस्या हल हो जाएगी ? क्या सरकार और समाज को छोटी एवं अधिक माइलेज देने वाली कारों की वापसी पर चर्चा नहीं करनी चाहिए ?

लेकिन आज नीतियाँ और बाजार क्या माननीय प्रधानमंत्री जी की मंशा के अनुरूप है ? नीतियाँ और बाजार, दोनों मिलकर बड़ी गाड़ियों को बढ़ावा देते दिखाई देते हैं। विज्ञापनों में पहाड़ों पर दौड़ती विशाल एस.यू.वी. दिखाई जाती हैं, जबकि महानगरों और छोटे शहरों में अधिकांश परिवार कारों का उपयोग रोज़ ऑफिस, स्कूल और बाजार जाने के लिए करते हैं।

आज पर्यावरण संकट विकराल बन चुका है। शहरों – कस्बों की हवा जहरीली हो रही है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। माइलेज कम होता जा रहा है। पार्किंग संकट, सड़कों पर टैफिक जाम विकराल होता जा रहा है। फिर भी हम ऐसी गाड़ियों की ओर क्यों भाग रहे हैं जो इन समस्याओं को और बढ़ाती हैं ? यह केवल अर्थशास्त्र, आयात-निर्यात, पर्यावरण का मुद्दा नही है बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी है।

भारत जैसे देश में छोटी कारें केवल आर्थिक विकल्प नहीं, पर्यावरणीय आवश्यकता भी है। छोटी कारें कम ईंधन खाती हैं, कम जगह घेरती हैं, ट्रैफिक पर कम दबाव डालती हैं और मध्यमवर्ग के लिए सुलभ होती हैं। सरकार को, समाज को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए। जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, वैसे ही छोटी, हल्की और अधिक माइलेज देने वाली कारों को भी विशेष प्रोत्साहन मिलना चाहिए। टैक्स में छूट, पार्किंग शुल्क में राहत, कम टोल और विशेष प्रोत्साहन योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। दूसरी ओर अत्यधिक बड़ी और अधिक ईंधन खपत करने वाली निजी गाड़ियों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने पर भी विचार होना चाहिए। हां, इन छोटी कारों में सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नही हो। छोटी कारों के उपयोग को प्राथमिकता देकर जनप्रतिनिधि भी इस दिशा में सार्थक पहल कर सकते हैं।

दरअसल देश को अब एक नई “ऑटोमोबाइल नैतिकता” की जरूरत है। ऐसी सोच, जिसमें वाहन केवल स्टेटस नहीं बल्कि जिम्मेदारी का विषय हो। जहां माइलेज पूछना शर्म की बात न हो। जहां छोटी कार चलाना पिछड़ापन नहीं बल्कि समझदारी माना जाए। जहां सड़क पर कम जगह घेरना भी सामाजिक योगदान समझा जाए। अब समय आ गया है कि भारत फिर से छोटी कारों की तरफ देखे, लेकिन इस बार मजबूरी में नहीं, समझदारी में। क्योंकि अगर पर्यावरण बचाना है, शहरों को बचाना है, ईंधन बचाना है और सड़कें बचानी हैं, तो केवल मेट्रो बनाना काफी नहीं होगा। अधिक माइलेज देने वाली छोटी कारों को फिर से सम्मान देना पड़ेगा। गाड़ी जितनी बड़ी, आदमी उतना सफल… हम सबको इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा।

वरना यह तय मानिये कि हमें आने वाले समय में सड़कों पर कारें कम और चलते-फिरते ड्राइंग रूम ज्यादा दिखाई देंगे।