Ujjain की हनुमान मूर्ति, आखिर हटाने की जिद के पीछे क्या है
छह दिन से जीतोड़ कोशिशें करने के बाद प्रशासन आखिर थक रहा है कि मूर्ति हटने का नाम ही नहीं ले रही
उज्जैन में हनुमान मूर्ति को हटाए जाने की जद्दोजहद में छह दिन बीत गए हैं। मंदिर और परिसर साफ करने के बाद जहां प्रशासन मान रहा था कि मूर्ति हटाना चंद मिनट का काम है उसी काम के आगे जेसीबी से लेकर बाकी दूसरी तकनीक भी घुटने टेक चुकी हैं और इस मंदिर से उन लोगों की भी आस्था जुडती जा रही है जिन्हें इस मंदिर के होने की शायद कभी जानकारी तक नहीं थी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर मंदिर और मूर्ति को विस्थापित या प्रतिस्थात करने की जरुरत ही क्यों आई और सरकारी जवाब है कि सिंहस्थ की तैयारियों के लिए यह जरुरी है कि सड़कें चौड़ी हों। अब यहां कमाल देखिए कि सिंहस्थ भी आस्था का पर्व है और यह मंदिर भोजकाल जितना पुराना न भी हो तो दशकों से श्रद्धा और आस्था का केंद्र तो रहा ही है। तो एक आस्था पर्व के लिए दूसरे आस्था केंद्र को उजाड़ना क्यों जरुरी महसूस हुआ? इसके दो कारण संभावित हैं, पहला तो यही कि करोड़ों भक्तों के आने से बड़ा पैसा भी आता है इसलिए बात श्रद्धा या आस्था कि न होकर यह है कि इतने बड़े मनी फ्लो को नजरअंदाज कैसे करें? यानी लोगों की सुविधा और श्रद्धा से बड़ा मामला पैसे का है। दूसरी बात यह कि ये सारी सड़कों के प्लान, निर्माण की योजनाएं और विकास के नमूने एयरकंडीशंड कमरों में बैठकर इस तरह बनाए जाते हैं कि इसमें आम लोगों, उनके घरों, उनके व्यापारों को तो छोड़िए भगवान तक को बेदखल करने से परहेज नहीं होता। इंजीनियर कागजों (अब कंप्यूटर) पर लाइनें खींच देते हैं और यदि इसमें किसी रसूख वाले का नुकसान न हो रहा हो तो बड़े साहब उसे पास कर देते हैं। परसेंट देकर आए ठेकेदार को जल्दी होती है कि वह फटाफट काम करे अपना पैसा निकाले और अगली जगह विकास पूरा करने जा पहुंचे। ऐसे में न किसी को यह चिंता होती है कि परियोजना की क्वालिटी बेहतर कैसे हो सकती है और न इस बात की कि पैसा कम से कम कैसे लगे रहा सवाल आम लोगों के घर, दुकान या श्रद्धालुओं की श्रद्धा का तो ये सारी बातें वो नोटों की गडि्डयां नहीं समझती हैं जो नेता, अफसर और ठेकेदारों के बीच बंटती घूमती हैं। चूंकि हनुमान मूर्ति का मामला अब नेशनल न्यूज बन चुका है इसलिए संभव है आगे पीछे यह निर्णय ले लिया जाए कि इसे नहीं हटाया जाएगा लेकिन जब यही योजनाएं सड़कों के लिए किसी जंगल को चीरते हुए गुजरती हैं तो कोई पेड़ इस विकट तरीके से अड़ नहीं सकता और यही वजह है कि एक एक सड़क लाखों लाख पेड़ों की निगलती चलती है। उज्जैन में हनुमानजी तो शायद अपनी जगह कायम रह जाएंगे लेकिन इंदौर के चोरल क्षेत्र के लाखों पेड़ बलि चढ़ाए जाएंगे जबकि इनमें से लगभग हर पेड़ हमारी आस्था में कुछ न कुछ महत्ता जरुर रखता है। जैसे आस्था के पर्व के नाम पर आस्था की जगह को उजाड़ने की नीतियां बनाते समय कुछ नहीं सोचा जाता ठीक वैसे ही कई बगीचे पेड़ों की घनी छांव हटाकर बनाए गए हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि घनी छांव से बगीचे की हरियाली के बीच कई सारे नोटों की गडि्डयां इधर से उधर हो जाती हैं। ठीक यही हाल आस्था की घनी छांव से कथित आस्था के हरियाले बगीचे तक की भी है।
