September 10, 2026
देश दुनिया

SC-ST ACT पर बहस लेकिन यह मुद्दा अब भी अछूता

अपनी असली पहचान के साथ सामने आना जरुरी होना चाहिए

आरक्षण पर काफी विचार सामने आ रहे हैं, पक्ष में भी और विपक्ष में भी। एससी-एससी एक्ट के सदुपयोग और दुरुपयोग पर भी विमर्श जारी है ही लेकिन एक ऐसा मुद्दा है जो इस सबमें चर्चा के केंद्र में ही नहीं आ रहा है और वह है असली पहचान का। जिस देश में इसली आईएएस को भी नकली आईएएस डपट रहा हो वहां मुझे तो लगता है कि पहली शर्त ही यह होना चाहिए कि किसी भी तरीके से असली पहचान की जिद बनी रहे। अभी एक मामला हुआ जिसमें एक व्यक्ति रिपोर्ट लिखाते हुए तो एससी होने के नाते धाराएं लगवाता है लेकिन जब यह बताना हो कि हम हिंदू नहीं हैं तो वह इंटरव्यू में साफ कहता है कि हम तो बौद्ध बन चुके हैं, कन्वर्ट हो चुके हैं। अब यहां बौद्ध धर्म की विशेषता ही यह है कि उसमें जाति का भेद नहीं है, बौद्ध यानी बौद्ध। ठीक यही खेल हम बचपन से देखते आ रहे हैं ईसाई धर्म अपना चुके गले में बाकायदा क्रॉस पहनने वाले आदिवासियों के साथ। मेरे गांव का ही मामला लें जहां एक परिवार में दादा का नाम तो राफेल रॉबर्ट था लेकिन उसने बेटे का नाम जॉन परमार रखा और जब जॉन के पांच बेटों और एक बेटी के नाम रखने की बारी आई तो वो सभी विजय, मनोज, प्रदीप, प्रताप और किशोर परमार थे। इनमें से एक तो ‘फादर’ बनने की राह पर चल निकला लेकिन बाकी सबने आदिवासी सर्टिफिकेट लगा लगा कर नौकरियां हासिल कीं। यहां तक कि शहर में एक मित्र से सालों तक संपर्क के बाद भी मुझ यह नहीं पता था कि यह पिछली दो पीढ़ियों से ईसाई हो चुके परिवार का सदस्य है। पिता क्लास वन ऑफिसर बने तो आरक्षण के जरिए और बेटे को सरकारी नौकरी मिली तो उसी जाति के प्रमाणपत्र से। दरअसल आज की सबसे बड़ी दिक्कत ही यह है कि लोगों को अपनी हकीकत छुपाना आ गया है ओर ऐसा करने वालों के लिए सजा का कहीं प्रावधान नहीं है बल्कि ईनाम हर कदम पर मौजूद हैं। इसे लेकर समय समय पर कोर्ट में जरुर मामले पहुंचे हैं लेकिन बात एक केस तक सिमट कर रह जाती है बजाए इसके कि वह उदाहरण बने। हालांकि हकीकत छुपाना सिर्फ आरक्षण तक सीमित नहीं है बल्कि हर कदम पर इस धोखे से ही हम जूझते हैं, याद कीजिए कसाब के हाथ वाला वह कलावा जो बेहद शामिल तरीके से उसके हिंदू होने का छलावा खड़ा कर सकता था। नाम बदलकर धोखा देने के कितने मामले कितनी बार कितनी तरह से हमारे सामने आते हैं। असली पहचान की जिद इसलिए भी जरुरी है कि असली वंचितों को तो ये रंगे सियार लोग कुछ पाने ही नहीं देते हैं। नीतियां उनके लिए बनती हैं जो सबसे पीछे हैं और उनका फायदा उठाने में सबसे अव्वल वही होते हैं जो दोनों हाथों से फायदे लूट रहे हैं। रविवार को चर्च में प्रेयर करते हुए जो ईसाई है वही अगले दिन नौकरी में आदिवासी है और वही किसी से झगड़ा होने पर एससी एक्ट लगवाने में सफल भी हो जाता है जबकि वास्तव में जो एससी एसटी वर्ग वंचित है उन तक फायदे न अस्सी साल में पहुंचे हैं और न वर्तमान व्यवस्था के साथ अगले अस्सी साल में ही पहुंचने वाले हैं।