… तो फिर लहू क्या है???
–चानी कनिक
असम बाढ़ पीड़ितों के लिए मुस्कान और उम्मीद लिए पहुंचे युवाओं की कहानी
एक शाम हमारा परिवार इंदौर स्थित अपने घर में बारिश के मौसम का आनंद ले रहा था। तभी सोशल मीडिया पर असम में आई भीषण बाढ़ की तस्वीरें और वीडियो सामने आए। डूबे हुए गांव, बेघर परिवार, रोते हुए छोटे-छोटे बच्चे, पानी में फंसे मवेशी और तबाह होता पर्यावरण—इन दृश्यों ने भीतर तक झकझोर दिया। उसी क्षण तय हो गया कि केवल दुख व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, हमें वहां जाकर अपनी क्षमता अनुसार मदद करनी चाहिए।
सबसे पहले मेरी मां चित्रकार मंशा, जो हमेशा से ही अपने स्तर पर सामाजिक कार्य करती रही हैं तथा हमें भी यही सीख देती रही हैं, बिना किसी हिचकिचाहट के साथ चलने की इच्छा जताई। बाद में परिस्थितियों को देखते हुए तय हुआ कि मेरे भाई क्षितिज और पति रोहित असम जाएंगे। क्षितिज कनिक देश के जाने-माने फिजिक्स प्रोफेसर हैं और पूरे भारत के विद्यार्थियों को NEET एवं JEE जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं। असम में भी उनके अनेक छात्र हैं। वहीं रोहित मिश्रा मत्स्य पालन क्षेत्र से जुड़े उद्यमी हैं और देशभर के हजारों मछली पालकों के साथ काम करते हैं। असम के कई मत्स्य किसानों की आजीविका इस बाढ़ में पूरी तरह प्रभावित हो चुकी थी। इसलिए दोनों ने वहां पहुंचकर परिस्थितियों के अनुसार राहत कार्य करने का निर्णय लिया।
शुरुआत हमने अपनी क्षमता अनुसार कुछ अस्थायी घर (टेम्परेरी शेल्टर) बनाने की योजना के साथ की। इसके बाद अपने मित्रों, परिचितों और आसपास के लोगों से सहयोग की अपील की। सबसे सुखद अनुभव तब हुआ जब लोगों ने बिना किसी आग्रह के स्वयं आगे आकर सहायता राशि भेजनी शुरू कर दी। केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोग ही नहीं, बल्कि डिलीवरी बॉय, किसान और छात्र भी अपनी पॉकेट मनी से सहयोग करने लगे। उस समय महसूस हुआ कि अच्छे कार्यों के लिए समाज में संवेदनशीलता आज भी जीवित है, बस किसी को पहल करने की आवश्यकता होती है।
असम पहुंचने के बाद जो वास्तविक स्थिति सामने आई, वह हमारी कल्पना से कहीं अधिक भयावह थी। बाढ़ आने के लगभग पंद्रह दिन बाद भी ऐसे अनेक गांव हैं जहां आज तक पीने का पानी, भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री नियमित रूप से नहीं पहुंच पाई है। स्थानीय लोगों ने हमें ऐसे कई गांवों की जानकारी दी जो अब भी पूरी तरह कटे हुए हैं। वहां सड़कें नहीं, केवल पानी है। ऐसे इलाकों तक हम केले के तनों से बनी पारंपरिक नावों के सहारे राहत सामग्री पहुंचा रहे हैं।
कई स्थानों पर आज भी कमर तक पानी भरा हुआ है। घरों के भीतर कीचड़ जमा है, पानी में सांप और कीड़े-मकोड़े हैं, वर्षों की मेहनत से जुटाया गया घर का सामान बह चुका है। लेकिन इन सबके बीच सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली बात वहां के लोगों का धैर्य और अपनापन था। जब हम राहत सामग्री लेकर पहुंचे तो उन्होंने मुस्कुराकर हमारा स्वागत किया, नींबू पानी पिलाया, हालचाल पूछा और जाते-जाते बस इतना कहा—”कल फिर आओगे ना? अगर आओ तो बच्चों के लिए स्कूल बैग ले आना, बाढ़ में बह गए हैं।”
उनकी जरूरतों की सूची भी बेहद साधारण थी—स्कूल बैग, बर्तन, कपड़े, दवाइयां और रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजें। डेढ़-दो साल के मासूम बच्चे सूखे रहने के लिए टोकरी में बैठे थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान फिर भी कायम थी। यह दृश्य देखकर मन भारी हो गया।
एक स्थानीय व्यक्ति ने हमें बताया कि यहां के लोगों को पान-सुपारी बहुत पसंद है। हमने सोचा कि राहत सामग्री के साथ थोड़ा पान-सुपारी भी ले चलते हैं। जब गांव में उसे बांटा गया तो बुजुर्गों के चेहरे पर वैसी ही चमक और खुशी दिखाई दी जैसी किसी बच्चे को उसकी मनपसंद चीज मिलने पर होती है। यह देखकर हमारे चेहरे पर भी मुस्कान आ गई।
राहत कार्य के दौरान एक और घटना हमेशा याद रहेगी। एक बुजुर्ग महिला पिछले पंद्रह दिनों से अपने घर तक नहीं पहुंच पाई थीं। हमारी नाव देखकर उन्होंने विनती की कि उन्हें उनके घर तक ले चलें। जब हम वहां पहुंचे तो पूरा घर पानी में डूबा हुआ था, केवल छत के कुछ हिस्से ही दिखाई दे रहे थे। वह दृश्य देखकर उनकी आंखों के साथ-साथ हमारी आंखें भी नम हो गईं।
इन सभी अनुभवों को क्षितिज और रोहित लगातार असम से फोन पर हमसे साझा कर रहे हैं।वे दोनों अभी भी दिन-रात राहत कार्य में जुटे हुए हैं और स्थानीय लोगों के सहयोग से उन गांवों तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं, जहां अब तक मूलभूत सुविधाएं भी नहीं पहुंच सकी हैं।
इन दिनों के अनुभव ने मेरे मन में कई सवाल भी खड़े किए। आखिर इन लोगों ने इतनी कठिन परिस्थितियों में जीना कैसे सीख लिया है? हर साल असम का यही हाल क्यों होता है? यह त्रासदी इतनी सामान्य क्यों मान ली गई है कि मुख्यधारा की मीडिया में भी इसे वह स्थान नहीं मिलता जिसकी यह हकदार है? लोग सहजता से कह देते हैं—”असम में तो हर साल बाढ़ आती है।”
लेकिन क्या किसी त्रासदी का हर साल होना उसे सामान्य बना देता है?
आज भी हजारों परिवार कमर तक पानी में रहने को मजबूर हैं। कई गांवों तक पीने का साफ पानी और भोजन तक नहीं पहुंच पा रहा। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर समय रहते पुनर्वास और स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जाते? हर वर्ष लोगों को उसी पीड़ा से गुजरने के लिए क्यों छोड़ दिया जाता है?
राहत सामग्री पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि ऐसी परिस्थितियां बार-बार पैदा ही न हों। जब तक स्थायी समाधान नहीं खोजे जाएंगे, तब तक हर साल कुछ लोग मदद करने आएंगे, कुछ लोग मदद पाएंगे, लेकिन हजारों परिवार फिर उसी दर्द को जीने के लिए मजबूर होंगे।
असम ने हमें केवल बाढ़ नहीं दिखाई, उसने इंसानियत, धैर्य और उम्मीद की ऐसी तस्वीर दिखाई है जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं। अब सवाल केवल इतना है—क्या हम हर साल ऐसी त्रासदी को सामान्य मानते रहेंगे, या फिर स्थायी समाधान की दिशा में गंभीरता से सोचेंगे?

