बाजार की ताकतों ने संवेदनाओं को भी गिरवी रख लिया है
जब आप दुर्घटनाओं की जानकारी पर दुखी हो रहे होते हैं तब भी बाजार के नियम अपना काम कर रहे होते हैं
– आदित्य पांडे
खबरों को इस तरह भी देखना शुरु कीजिए कि इंदौर में भीषण अग्निकांड को लेकर जब मेंने यह जानने की कोशिश की कि आखिर वह ई कार कौन सी थी जिसके चार्जिंग पाइंट से शॉर्ट सर्किट की पहली चिंगाारी निकलने की बात कही जा रही है। आगे की खबर, उसमें आठ लोगों की मौत की खबर, मृतकों के नाम और बाकी जानकारियां जब इफरात में मौजूद थीं तब भी गाड़ी का नाम कहीं शामिल नहीं था। वैसे यह गाड़ी थी टाटा की पंच ईवी जो शायद आठ महीने पहले ली गई थी लेकिन मेरा सवाल वहीं मौजूद है कि आखिर ऐसी क्या वजह है कि इतनी सारी जगहों पर खबर है लेकिन कोई भी उस ब्रांड का नाम नहीं लिखना चाह रहा है। समझिए जिस भीषण अग्निकांड में आठ लोग जिंदा जलकर मारे जाते हों उस समय पर भी इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि कार कंपनियां और उनकी फ्रेंचाइजी साल भर में कितना विज्ञापन देती हैं। अब इस बात की भयावहता में और मुद्दे जोड़ते जाइये। जैसे कि मेरे कॉलेज के दिनों में एक बार उस गाड़ी को रोक कर चालान किया गया था जिसमें म्यूजिक सिस्टम लगाकर ड्राइवर गाने सुन रहा था और तर्क यह था कि इससे चलाने वाले का ध्यान भटक जाता है लेकिन अब यह दौर है कि हर कंपनी इंफोटेनमेंट सिस्टम के बड़े से बड़ा होते जाने को फीचर की तरह पेश करती हैं। जरा देखिए कि इन दिनों बिक रही गाड़ियों में ड्राइवर का ध्यान न भटके वाले मुद्दे पर कितना जोर है और इस बात पर कितना कि चलाने वाला ज्यादा से ज्यादा इंटरटनेमेंट में ही डूबा रहे। वजह? वजह वही कि इन कार कंपनियों की ताकत इतनी ज्यादा है कि वो चाहें तो नियमों को ताक पर रखा जा सकता है। ऐसे ही एक और बात पर गौर कीजिए, एक बार मैंने इस बात पर भी सवारी बसों के चालान होते देखा कि बस में (आपातकालीन दरवाजे और ड्राइवर वाले दरवाजे से इतर) दो दरवाजे क्यों नही हैं। लेकिन जैसे जैसे एसी बसों के आने से कई सारे ब्रांड आए उसी अनुपात में नियम लचीले होते गए और अब यह हालत है कि ज्यादातर बसों का मुख्य दरवाजा आगे की तरफ इस तरह होता है कि यदि आगे से बस दुर्घटनाग्रस्त होकर आग का शिकार हो तो निकलना मुश्किल हो जाए। ऐसा नहीं कि ये बातें कल्पना हों बल्कि पिछले एक महीने में ही बसों में आग लगने की घटनाओं पर नजर डालें तो शर्तिया ये संख्या दस से ऊपर ही होगी। बताया जा सकता है कि बसों की बॉडी बनाने वालों से लेकर सड़कों पर इनके उतरने तक के कितने नियम हैं और इनके पीछे कितने शोध वगैरह शामिल किए गए हैं लेकिन यकीन मानिए ऐसा कोई शोध आगे की तरफ इतने खतरनाक तरीके वाले और बेहद संकरी जगह से निकलने वाली डिजाइन का समर्थन नहीं कर सकता। दरअसल ऐसी एक नहीं कई गड़बड़ियां हैं जिन पर महज इसलिए धूल डाली जाती है क्योंकि यदि इन पर नकेल कसी गई तो बात एक प्रभावी कॉकस को नाराज करने तक जा पहुंचती है। हालांकि यह भी मानना होगा कि पिछले कुछ समय में देश की ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को कई ऐसी कड़वी गोलियां निगलनी पड़ी हैं जिनके लिए वो तैयार नहीं थे। मसलन कार कंपनियों को सुरक्षा के कुछ विकल्प बेसिक गाड़ियों में भी देना जरुरी हो गया है जबकि ये फीचर ऑटो कंपनियां प्रीमियम की तरह बेचती रही हैं। सुरक्षा वाले एयरबैग्स के मामले में तो लंबे समय तक ऑटो कंपनियों ने विरोध भी दर्ज कराया लेकिन आखिर उन्हें सरकार की बात माननी पड़ी लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सबसे ज्यादा बिकने वाली गाड़ियों में बड़ा हिस्सा उन कारों का है जो सेफ्टी के मामले में शून्य का दर्जा रखती हैं। हद यह कि मीडिया का बड़ा हिस्सा ऐसी बातों पर ग्राहकों को जागरुक करने का प्रयास करता भी नहीं दिखता है और वह बस इतनी सी कि कहीं ये कंपनियां नाराज न हो जाएं वरना एक बड़ा आय का सत्रोत हाथ से चला जाएगा। यही वजह है कि आपकों पचासों वो लेख मिल जाएंगे जिनमें इन गाड़ियों की बड़ाई बढ़ा चढ़ाकर दिखाई जाएंगी, नए फीचर्स का ऐसे बखान किया जाएगा मानो इनके बिना आपका जीवन ही अधूरा है लेकिन कभी यह नहीं बताया जाएगा कि आपकी सुरक्षा के लिहाज से फलां को बिलकुल नहीं खरीदा जाना चाहिए या इस गाड़ी के इस मामले को लेकर इतनी दिक्कतें हैं कि इससे दूरी रखनी चाहिए। विज्ञापन देने वालों का मीडिया हाउस इतना ध्यान रखते हैं कि उनके खिलाफ एक भी शब्द जाने की गुंजाइश नहीं रखी जाती चाहे वो कोचिंग क्लासेस हों, चाहे ज्वेलरी के बड़े ब्रांड या ये कार कंपनियां ही क्यों न हों। बुरी से बुरी गाड़ियों को इतने चमकीले शब्दों के साथ पेश किया जाता है कि आप उससे प्रभावित हुए बिना न रह सकें। जब आप मीडिया के लिए महज एक ग्राहक हों तो आपको उनसे यह उम्मीद नहीं ही करना चाहिए कि वो यह बताने की जहमत उठाएंगे कि आखिर दुर्घटना के पीछे किस ब्रांड की किस गाड़ी के होने की संभावना है। माना जाता है कि जब एक दुर्घटना में ब्रिटिश (तत्कालीन प्रिंसेस) डायना की मृत्यु हुई थी तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मर्सिडीज ब्रांड का नाम खबर में साथ ही नजर आया और इसका खामियाजा ब्रांड को उठाना पड़ा था और माना जाता है तभी से कार कंपनियों ने इस बात का खास ध्यान देना शुरु कर दिया कि उनके ब्रांड का नाम किसी दुर्घटना के मामले में सामने न आए। यह एक ऐसी शर्त है जिसका मीडिया आदेश मानकर पालन करता है, यहां तक कि कुछ जगहों पर तो दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी पर लोगो नजर न आ जाए इस बात का भी पूरा ध्यान दिया जाता है। यकीन मानिए जिस समय आप साठ लोगों की असामयिक और दर्दनाक मृत्यु पर दुखी हो रहे होते हैं तब भी बाजार की ताकतें अपना काम कर रही होती हैं और एक कार के ब्रांड का नाम जानने भर के लिए आपको बीसियों कोशिशें करनी होती हैं।
