Bharat Bhawan में पत्रकारिता पर विमर्श का तीन दिवसीय आयोजन संपन्न
‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ विराम तक चलते रहे विमर्श के दौर, स्वाभिमानी भारत विषय पर बोले चंद्रप्रकाश द्विवेदी- सुशासन हमारे वांग्मय का महत्वपूर्ण हिस्सा
भोपाल के भारत भवन में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर तीन दिवसीय ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ विमर्श में ‘स्वाभिमानी भारत’ विषय पर निर्माता एवं अभिनेता डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने कहा कि भारतीय वांग्मय में सुशासन को लेकर कई उल्लेख हैं। यहां तक कि रामायण में श्रीराम ने भरत से सुशासन को लेकर 88 प्रश्न किए हैं। महाभारत में भी इसी प्रकार के प्रश्न नारद से पूछते हैं। सत्र में हितेश शंकर ने शब्दों के निर्माण और उनके पीछे की संस्कृति को समझाते हुए कहा कि रूस में पंखे के लिए कोई शब्द नहीं है क्योंकि वहां गर्मी नहीं है। इसी प्रकार अंग्रेजी में घी के लिए कोई शब्द नहीं है। कार्यक्रम के समापन सत्र में कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि भारत भवन में तीन दिन से चल रहे राष्ट्रीय संविमर्श ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ का आज समापन नहीं बल्कि एक विराम है। अब हम उदन्त मार्तण्ड को प्रणाम करने इस कार्यक्रम को लेकर उसके जन्म की भूमि पश्चिम बंगाल (कोलकाता) जाएंगे और फिर अन्य स्थानों पर जाकर यह समारोह करेंगे। उन्होंने कहा यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए कार्यशाला भी रहा है। विद्यार्थियों ने आयोजन में समाचार पत्र निकाला, न्यूज़ बुलेटिन निकाले और पॉडकास्ट किए। ‘भारतीय भाषाओं का राष्ट्रीय स्वर’ पर परिचर्चा का आयोजन हुआ, जिसमें हर्षवर्धन त्रिपाठी, सुश्री जयंती रंगनाथन, डॉ. कृपाशंकर चौबे और शैलेश पांडेय ने अपने विचार रखे। सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार अनिल पांडेय ने किया। वरिष्ठ पत्रकार श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि हमारी परंपरा संवाद की बात करती है, विवाद की नहीं। भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय स्वर की बात करते हैं तो हमें आदि शंकर से शुरू करना चाहिए। आदिगुरु शंकर ने कहा कि देश को एक रखने के लिए चारों कोनों पर पीठ स्थापित करनी होगी। वरिष्ठ पत्रकार सुश्री जयंती रंगनाथन ने पत्रकारिता के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि मेरी मातृभाषा तमिल है लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं ने भी मेरी पत्रकारिता को ताकत दी है। मैंने हिंदी के प्रतिष्ठित पत्र धर्मयुग से अपनी पत्रकारिता की। उन्होंने कहा कि तेलगु भाषी होने के कारण से मुझे कई बार लाभ मिला। विद्यार्थियों को एक से अधिक भाषाएं सीखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज के पत्रकार हमारी पीढ़ी से अधिक समृद्ध है। उनकी अंगुलियों पर टेक्नोलॉजी नाचती है। अपनी पत्रकारिता में तकनीक का खूब उपयोग कीजिये। उन्होंने कहा कि हम सबको अपने काम से मोहब्बत होनी चाहिए। हमें वही काम करना चाहिए, जिसमें हमें आनंद की अनुभूति हो। पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी ने कहा कि हमें पत्रकारिता में कम बोलना, सार्थक बोलना और अपने बनाये नियम का पालन करना चाहिए। पत्रकार एवं लेखक श्री राशिद किदवई ने कहा कि हम पत्रकारों को अपना आत्मावलोकन करना चाहिए। जब हम अपनी ख्वाहिश को खबर का रंग देते हैं तो हमारे गलत होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। हमें याद रखना चाहिए कि हम जो चाहते हैं, वैसे सारा समाज नहीं सोचता है। वरिष्ठ पत्रकार अनुज खरे ने कहा कि आपके बनाए कंटेंट को गूगल और मेटा जैसी बड़ी मीडिया टेक कंपनी दर्शकों/पाठकों तक पहुंचा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि एआई कंटेंट के समय में भी मौलिक कंटेंट की आवश्यकता और महत्व बहुत अधिक है। कंटेंट बनाने वालों को आत्मावलोकन करना चाहिए कि वे क्या कंटेंट बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया का मार्केट 83 हजार करोड़ रुपये का है, जिसमें से 3000 करोड़ रुपये का मार्केट ही न्यूज़ के पास है। पत्रकार शरद गुप्ता ने कहा कि मौलिक होना सबसे जरूरी है।’भारतीय पत्रकारिता के स्वर्णिम पृष्ठ’ पर विजयदत्त श्रीधर के ग्रंथ ‘समग्र भारतीय पत्रकारिता’ पर चर्चा में डॉ. कृपा शंकर चौबे ने कहा कि श्रीधर ने तीन दशक के परिश्रम से भारतीय पत्रकारिता का दस्तावेजीकरण किया है जो तीन दशक से गूगल का काम कर रहे हैं। शोधकर्ता जवाहर कर्णावट ने कहा कि विदेश में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को 143 वर्ष हो गए हैं। इस अवसर पर डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि पत्रकारिता शास्त्र भी है और शस्त्र भी। कार्टून कला पर जो कार्यशाला हुई, वह अनुकरणीय है। वीर भारत न्यास के श्रीराम तिवारी ने कहा कि प्रणाम उदन्त मार्तण्ड को याद करने का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी अपने जन्म से ही प्रतिरोध की भाषा रही है। भारत भवन के अधिकारी प्रेमशंकर शुक्ला ने भी आयोजन को लेकर अपने विचार साझा किए। आभार ज्ञापन कुलसचिव प्रो. पी. शशिकला ने आभार ज्ञापन किया। सत्र का संचालन कार्यक्रम के संयोजक प्रो. संजय द्विवेदी ने किया।
