April 8, 2026
देश दुनिया

Supreme Court ने कहा अंधविश्वास की परिभाषा हम तय कर सकते हैं

सॉलिसिटर जनरल ने केंद्र की तरफ से सबरीमाला मामले में कहा था कि आप कानून के विशेषज्ञ हैं धर्म के नहीं

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि सर्वोच्च अदालत को यह तय करने का अधिकार है कि वह देखे किसी धर्म में कोई चीज अंधविश्वास है या नहीं। इस मामले में 2018 के फैसले के बाद धर्म के अंधविश्वास की परिभाषा तय करने के अधिकार क्षेत्र पर उठे सवालों के जवाब में यह कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के तर्क खारिज करते हुए कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र सुप्रीम कोर्ट रखता है। सबरीमाला मामले में केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। ऐसे में कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाए तो यह तय करना अदालत का दायरा नहीं है, बल्कि इस पर सुधार कानून बनाना विधायिका का काम है। मेहता ने तर्क दिया कि कोर्ट किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास नहीं करार दे सकती क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं। भारतीय समाज के विविध होने का तर्क रखते हुए मेहता ने कहा कि विश्वास और अंधविश्वास के बीच तय करना या दो समाजों को एक ही नजरिए से किसी बात को अंधविश्वास बता देना सही नहीं होगा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि किसी आवश्यक धार्मिक प्रथा को देखते हुए उस धर्म की फिलॉसफी पहले समझना चाहिए क्योंकि आप किसी एक धर्म के विचारों को दूसरे पर लागू नहीं कर सकते। जिस तरह की बहस इस मामले में सामने आई है उससे साफ है कि अब धर्म के मामले में किसी तरह े दखल देने या न देने को लेकर अदालती सीमाओं की बात तय हो सकती है।