UPSC Selection और मनोहर कहानियों के पीछे की दुनिया
- आदित्य पांडे
यूपीएससी की कृपा औद परदे के पीछे चल रहे खेल छुपाए तो नहीं जाते परचून, रिक्शे वाले और कुली का कहानियों के पीछे
पिछले कुछ सालों में हर बार यूपीएससी के रिजल्ट आते ही उन खबरों की बाढ़ आ जाती है जिसमें किसी किसान, परचून वाले या रिक्शा चलाने वाले के बच्चों की सफलता की बातें बढ़ा चढ़ाकर बताई जाती हैं। इस बार भी वही बात सामने आई कि एक परचून की दुकान वाले की बच्ची अब कलेक्टर बन जाने वाली है, खंगाला गया तो पता चला कि परिवार अच्छा खासा कमाने खाने वाला है, बच्ची ने अंग्रेजी माध्यम से अच्छे स्कूल में पढ़ाई की है। एक मामले में तो उस लड़की का ही इंटरव्यू ले लिया गया जो सफल ही नहीं रही है। वाकई किसी गरीब या सामान्य से कम स्तर वाले के बच्चे का यूपीएससी में सिलेक्शन उस परिवार के लिए जिंदगी बदल देने वाला क्षण होता है लेकिन यहीं से कुछ सवाल भी उठते हैं कि ऐसी खबरों को चलाने की जल्दबाजी आखिर क्यों होती है और क्या ये खबरें तैयारी कर रहे बच्चों को प्रेरणा देने के लिए ही सामने आती हैं या इसके पीछे का खेल ही कुछ और है। हमें पिछले कुछ समय मिली यूपीएससी की कार्यशैली वाली बमुश्किल सामने आई कुछ खबरों के मद्देनजर इन्हें देखना चाहिए। याद कीजिए एक नाम कुछ समय पहले चर्चा में आया था, पूजा खेड़कर। विवादों में उलझने के बाद जब इनका सिलेक्शन खंगाला गया तो पता चला कि ये तो गलत सर्टिफिकेट के आधार पर कितना आगे तक जा चुकी थीं। घटना सामने आने के बाद यूपीएससी की प्रक्रिया को करीब से देखा जाना शुरु हुआ तो पता चला कि जिन लोगों ने दिव्यांग होने के सर्टिफिकेट के आधार पर सीट हासिल कर ली है उनके इन प्रमाणपत्रों की जांच में ही बड़ी धांधली है। जिसने आंखों से कम दिखाई देने का प्रमाणपत्र दिया है वह मजे से कार दौड़ा रहे हैं, घुड़सवारी कर रहे हैं और स्टंट करते नजर आ रहे हैं वहीं जिन्होंने पैर में दिक्कत होने की बात बताई है वो बढ़िया दौड़ लगा रहे है, तुलसीदास कहते थे कि रामजी की कृपा से ‘पंगु लंघयते गिरिम’ लेकिन यहां यूपीएससी की कृपा से ऐसे लोग न सिर्फ पहाड़ चढ़ रहे हैं बल्कि अफसरी की सबसे ऊंची सीढ़ियां भी मजे से चढ़ रहे हैं। दूसरी बड़ी धांधली पीएच और ईडब्ल्यूएस वाले प्रमाणपत्रों की है जहां खुद के गरीब बताए जाने के सारे सरंजाम जुटा लिए जाते हैं और एक बार सिलेक्शन हो जाए तो कौन देखने आता है कि आप गरीब थे भी या नहीं। कोचिंग माफियाओं का भी इसमें बड़ा खेल है और उनका इस सारे मामले में अपना ही खेल चलता रहता है। जब ऐसी बातों और हरकतों का पता चलता है तो समझने की कोशिश करते हैं कि कहीं ऐसी एक दो कहानियां सामने रखने के पीछे कोई बड़ी वजह तो नहीं है जहां ऐसी मनोहर कहानियां परोस कर पिछले दरवाजे से बड़े खेल किए जा रहे हों। हद यह है कि गलत प्रमाण पत्रों के जरिए सिलेक्ट होने का यह खेल और वेरिफिकेशन में धांधली का पूरा मजमा लंबे समय से सफलता से चल रहा है और ऐसे झूठे प्रमाणपत्रों की बातें सामने आ जाने के बाद भी कोई बड़ी कार्रवाई कभी देखी नहीं गई। यहां तक कि ऐसे मामलों में भी जो पब्लिक डोमेन में आ चुके हें और जिन पर लोगों की नजर भी है। हर वर्ष देशभर से लाखों अभ्यर्थी इसमें बैठते हैं जिनसे चुने जाने वालों की संख्या हजार भी नहीं होती। जाहिर है जो इस कठिन परीक्षा में सफल हैं वो स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनते हैं। यहीं से शुरु होती है उन मनोहर कहानियों की पृष्ठभूमि जहां पर सफल बच्चों की गरीब पृष्ठभूमि और सफलता के लिए की गई मेहनत की बातों को अतिशयोक्ति के स्तर तक ले जाने में भी पीछे नहीं हटा जाता है और जब नमक मिर्च लगाकर ये कहानियां आपके सामने तक पहुंचती हैं तो इससे तीन निशाने सधते हैं। पहली तो यही कि आपको रोचक कहानी मिलती है, दूसरा यह कि इससे कोचिंग संस्थानों के लिए नई राहें खुलती हैं और तीसरी बड़ी बात यह कि इन कहानियों के भुलावों के बीच यूपीएससी की लचर प्रक्रिया पर इस तरह लीपापोती की जाती है मानो यहां सबके लिए बराबर के अवसर हों और इसमें रिक्शे वाले के बच्चे से लेकर कुली तक के लिए बराबरी से मौके मिल रहे हों और यूपीएससी की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी है कि कोई भी कहीं से भी आकर आईएएस तक की छलांग लगा सकता है। ऐसी खबरें वास्तविकता से ज्यादा आकर्षण पैदा करने या भावनात्मक कहानी पेश करने के दबाव जैसी भी लगने लगती हैं। सफल अभ्यर्थी की कहानी देश भर में सनसनी की तरह फैलाए जाने की कोशिश में कौन कौन विशेष रुप से शामिल होते हें इस पर नजर रखना भी रोचक विषय है। आज कोचिंग संस्थान बड़े विज्ञापनदाता हैं और उनके हितों के लिए काम करने के लिए समाचार माध्यम पूरी प्रतिभा झोंकते हैं, फिर उसमें थोड़ी मिलावट उनकी तरफ से भी हो जाए तो इसे गलत नहीं माना जाता। यूपीएससी को इसमें सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि उससे इन अपवाद वाली कहानियों के चलते कई सवालों के जवाब ही नहीं देना पड़ता। गांव वाली पृष्ठभूमि और परचून की दुकान वाले की बच्ची की सफलता इस बार की मुख्य कहानियां हैं लेकिन समझने की कोशिश कीजिए इस चमकते परदे के पीछे की कोई उस बड़ी कहानी की। वैसे इस बार एक बात पर और भी ध्यान दीजिएगा, उर्दू में दी गई परीक्षा में सफल हुए नामों पर। यदि इंडेक्सिंग वेटेज का यही हाल है तो यूपीएससी को इसका भी जवाब देना चाहिए लेकिन जवाब मांगने वाली आवाजें तो वो कहानियां सुनने-सुनाने में व्यस्त हैं जहां बताया जा रहा है कि कैसे ब्रम्हानंद मुखिया की बेटी ने यूपीएससी क्रैक कर ली है और जिसे लेकर यूपीएससी सफाई दे रही है कि 301वीं रैंक में सफल हुई लड़की वह है ही नहीं।
