UCC यानी समान नागरिक संहिता का मामला अब केंद्र के पाले में
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के चलते महिलाओं के अधिकार प्रभावित होने पर किया विचार
सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर कहा है कि इसे लागू करने का सही समय आ गया है, हालांकि इसके आगे का मामला कोर्ट ने केंद्र सरकार पर छोड़ दिया है। अदालत ने कहा कि इस संदर्भ में शरीयत कानून की धाराओं को रद्द करने जैसे मामलों पर अंतिम फैसला विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया है कि शरीयत कानून मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभाव करते हैं और उनके अधिकारों को सीमित करते हैं। इस याचिका की सुनवाई के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि यदि न्यायालय शरीयत के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधान रद्द कर दे तो कानूनी खालीपन की स्थिति आ सकती है, क्योंकि अभी मुस्लिम उत्तराधिकार पर कोई अन्य स्पष्ट कानून नहीं है। कोर्ट ने कहा कि याचिका में भेदभाव का मुद्दा मजबूत है, लेकिन इस पर निर्णय संसद ले तो ज्यादा सही होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद से समान नागरिक संहिता लागू करने पर विचार करने की सिफारिश पहले भी की जा चुकी है। समान नागरिक संहिता का मुद्दा लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। संविधान के अनुच्छेद 44 में नीति-निर्देशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता का उल्लेख है लेकिन इसे लागू करना अब तक टलता ही रहा है। कोर्ट ने इसे विधायी ढांचे से ही आगे बढ़ाने की बात कही है और मुस्लिम पर्सनल लॉ की धाराओं पर भी सीधा सवाल उठाया है। कोर्ट ने कहा है कि महिलाओं के अधिकारों की रक्षा जरुरी है। आजर की सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट की दृष्टि से दो बातें तो साफ हैं, पहली यह कि यूसीसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर है और चाहती है कि संसद भी इस विषय को गंभीरता से ले और दूसरा यह कि कोर्ट ने माना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के चलते मुस्लिम महिलाओं को उनके हक नहीं मिल रहे हैं।
