February 11, 2026
देश दुनिया

UGC के ‘जहरीले’ नियमों पर 19 फरवरी तक ‘सुप्रीम’ रोक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा ऐसे नियमों से भेदभाव और दुरुपयोग की आशंकाओं पर किया गौर

अगले बीस दिनों तक तो कम से कम यूजीसी के लाए गए ‘समता विनियम 2026’ पर रोक लग ही गई है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक पीआईएल की सुनवाई में इसके दुरुपयोग की आशंका को गंभीरता से लिया और इसे अगली सुनवाई यानी 19 फरवरी तक के लिए रोक दिया। पिछले कुछ दिनों से देश भर में इन नए नियमों के विरोध में प्रदर्शन ही नहीं चल रहे थे बल्कि जनमानस में उबाल भी था। जातिगत भेदभाव को खत्म करने के उद्देश्य से लाए गए इन कायदों के चलते भेदभाव के बढ़ने की संभावना ही ज्यादा लग रही थी। अब 19 फरवरी तक तो 2012 वाले पुराने नियम ही लागू रहेंगे। इसे लेकर हुई सुनवाई में कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे नियमों से समाज में विभाजन की संभावना बढ़ती है और भारत की एकता को शिक्षा संस्थानों में भी नजर आना चाहिए। 2012 नियमों में भेदभाव की परिभाषा व्यापक है और इसमें सभी छात्रों के लिए समान अवसर दिखते हैं लेकिन 2026 वाले नियमों में एससी एसटी के अलावा पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और महिलाओं को भी शामिल करते हुए कई नए प्रावधान कर दिए गए जिनमें 24 घंटे में बैठक और समयसीमा में निर्णय की भी बात तो रखी गई लेकिन झूठी शिकायत पर कार्रवाई का मौजूदा प्रावधान भी हट गया था। इन्हें बिंदुवार ऐसे समझें कि

  1. भेदभाव की परिभाषा में सामान्य वर्ग भी शामिल हो सकता था जबकि नए नियम में सामान्य वर्ग को बाहर माना गया।
  2. 2026 के दिशानिर्देशों में पिछड़ा वर्ग भी संरक्षित श्रेणी में शामिल कर दिया गया।
  3. जाति भेदभाव की बात करते समय ‘सभी छात्रों’ का विशेष उल्लेख था जबकि नए नियम में ऐसा कोई उल्लेख नहीं।
  4. नए नियम अनिवार्य किए गए जबकि पहले वाले सलाह बतौर थे, जाहिर है नए नियम न मानने पर कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया।
  5. 2026 में संरक्षण का दायरा बढ़ाकर फैकल्टी, स्टाफ और जेंडर माइनॉरिटी तक बढ़ गया, जबकि पहले बात सिर्फ छात्रों की थी।
  6. नया सिस्टम बनाना जरुरी किया गया, जैसे समानता कमेटी, समानता स्क्वॉड, समानता एम्बेसडर और 24 घंटे की हेल्पलाइन।
  7. शिकायत पर समयसीमा सख्त, 24 घंटे में बैठक और 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई जरुरी कर गई।
  8. नए नियम में परोक्ष, अप्रत्यक्ष और संरचनात्मक भेदभाव भी कार्रवाई के दायरे में ले ली गई।
  9. नए नियम में झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं है।
  10. अकादमिक स्तर पर भेदभाव पूरी तरह जातिगत कर दिया गया और इसमें सभी छात्रों का दायरा नहीं रखा गया।