वाम की बिखरी किरचों से बचिए
– आदित्य पांडे
कॉलेज कैंपस के पहले दिन ही एक अधेड़ सा व्यक्ति मुझसे बात करने के लिए उत्सुक सा लगा। मेरे लिए यह बात अजीब थी कि इस उम्र का व्यक्ति जिसे अपने पत्नी बच्चों और रोजगार की चिंता होना चाहिए थी, वह यहां नए आए छात्रों के बीच मौजूद है। मामूली सी शुरुआती बातचीत के दौरान ही मुझे उन सज्जन ने देख लिया जिन्हें परिवार वालों ने कॉलेज में मेरा ध्यान रखने का जिम्मा दिया था। उसी शाम को उन्होंने समझाया कि यह व्यक्ति ‘बकवास’ किस्म का है और इससे दूरी रखने में ही भलाई है। मैंने उनकी बात का पहला हिस्सा तो मान लिया लेकिन दूसरे हिस्से को लेकर यह लगा कि दूर रहने के बजाए बकवास को भी थोड़ा तो समझना ही चाहिए। गंदा झोला और उससे भी ज्यादा बिखरा हुआ खुद उसका व्यक्तित्व, पैर में कोल्हापुरी टाइप चप्पल। जिसे पानी शरीर पर लगाए कुछ दिन हो चुके हों ऐसे व्यक्ति के पास बैठना थोड़ा मुश्किल तो था लेकिन धैर्य रखा कि मामला आखिर बकवास व्यक्ति को समझने का था। उसकी बातें कॉलेज के सिस्टम में खराबी से शुरु होतीं और बढ़ते बढ़ते हर क्षेत्र में फैले कथित असंतोष पर पहुंच जातीं। वह न जाने कहां घात लगाए बैठा होता जो हर समय ऐसी चाय के लिए ऑफर करते हुए सामने आ जाता जिसके पैसे उसे नहीं देने होते थे। एक दिन उसने मुझे ऐसी लाइब्रेरी के बारे में बताया जो करीब ही थी। यह उस समय उसका अहसान सा लगा था कि वाह क्या जगह दिखाई है। छोटी सी ही लाइब्रेरी थी जिसमें चुन चुनकर किताबें रखी गई थीं और ये चुनाव बड़ा सलीके का था। इसी जगह मेरी मुलाकात फैज् से हुई, यहीं मैं चे ग्वेरा की मोटरसाइकल पर थोड़ी सैर कर आया, यही वह जगह थी जहां मार्क्स से लेकर माओ तक के जिंदगी में झांकने का मौका मिला। यहां के रजिस्टर की एक खास बात थी कि आप जो किताब इश्यू करा रहे हैं उसका तो नाम वगैरह लिखा ही जाता था आप जो पढ़ रहे हैं उस पर भी बाकायदा नजर होती थी। मेरे वहां होने को लेकर वे इतने निश्चिंत थे कि मैं उनसे प्रभावित तो हो ही जाऊंगा और मेरे किताब चयन से वह यह तय करने की कोशिश में थे कि मैं जमीनी कार्यकर्ता रह कर कोशलनिकोव संभालने लायक हूं या मेरे लिए हैंड ग्रेनेड फेंकने की ट्रेनिंग अच्छी रहेगी या फिर मुझे अर्बन नक्सल बनने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए। चूंकि तब तक अखबारों में मेरे कई कई विशेष पत्र छप चुके थे जिस पर संपादक की टिप्पणी देवेंद्र शर्मा की चिड़िया बोलती थी इसलिए ध्यान अखबारों के पैटर्न पर भी गया। हिंदी का एक लोकल अखबार आता लेकिन अंग्रेजी के द हिंदू से लेकर इंडियन एक्सप्रेस तक सब मौजूद होते जबकि ये अगले दिन आते थे यानी एक दिन बासी। इनके कुछ खास आर्टिकल पर लाल निशान भी अक्सर होते और हम बड़ी श्रद्धा से इन्हें पढ़ते चूंकि यही नुस्खा पीएससी में सफलता के लिए ‘दवा की पर्ची’ की तरह बताया जाता था। यहां वह अधेड़ अकेला नहीं था बल्कि उसके कुछ और संगी साथी भी थे। आप एक किताब उठाने जाएं तो वो दो और सुझाने के लिए तैयार बैठे होते। वे किताब को पढ़ने से पहले एक मानस तैयार करने की भी भूमिका बांध देते थे। भगत सिंह की किताब हाथ में लेने से पहले ही कोई यह बता जाता कि कैसे उन्होंने धर्म को मानने से इंकार करते हुए नास्तिक रहते फांसी झेली। जाहिर है पूर्व पीठिका ऐसी बना दी जाए तो पढ़ने का एक नजरिया तो तय हो ही जाता लेकिन मेरे साथ मामला अलग इसलिए हो गया था क्योंकि बकवास व्यक्ति करार दिए गए व्यक्ति की बातों को लेकर पहले ही आशंका उठ खड़ी होती। मेरा परसाई से भी पहला परिचय वहीं हुआ और उनकी ही भाषा में कहूं तो जहरमोहरा मुझे पहले ही मिल गया था इसलिए कितने ही चूहे ऊपर नीचे उछलकूद करते रहे मुझे फर्क नहीं पड़ा। वे चाहते थे कि मैं पाश के उन हिस्सों पर जोर दूं जिसमें वह ‘भारत का नागरिक होने पर थूकता हूं’ कहे और मुझे उसकी वो पंक्तियां रास आतीं जिनमें वह कहे ‘मैं आदमी हूं, बहुत कुछ छोटा छोटा जोड़कर बना हूं और उन सभी चीजों के लिए जिन्होंने मुझे बिखर जाने से बचाए रखा…मेरे पास बहुत शुक्राना है’ या कि ‘प्यार करना और जी सकना उन्हें कभी नहीं आएगा जिन्हें जिंदगी बनिए बना दिया’. बचकानी सी चीजें पढ़ना हों तो मैं बच्चों के लिए आने वाली एक पत्रिका हाथ में ले लेता लेकिन इन सारी चीजों के अर्थ मुझे बहुत बाद में समझ आए और यह जानकारी भी बाद में ही मिली कि जिसे मैं सिर्फ बकवास व्यक्ति की तौर पर गंदे हुलिए से जानता था वह दरअसल नक्सल के गढ़ सुकमा में कई बार काफी समय बिता कर आ चुका था और अब ‘अर्बन नक्सल’ था। हालांकि ये सब इतने बाद में पता चला कि तब तक मेरा कॉलेज कैंपस ही नहीं यूनिवर्सिटी भी बदल चुकी थी लेकिन इस एक साल के सबक और सीखें अब तक काम आ रही हैं। गांव से आने वाले मुझ जैसे व्यक्ति के लिए यह जानना ही किसी झटके से कम नहीं था कि समाज में पुरुष और महिलाओं के अलावा तीसरा जेंडर भी होता है और उससे भी ज्यादा यह कि एलजीबीटीक्यू की अपनी टर्मिनोलॉजी है और न जाने के कितने अलग अलग सोच के ग्रुप हैं जिनमें हेट्रो, मेट्रो जैसे न जाने कितने भेद छुपे हुए हैं। अगले ही कॉलेज में जब छात्र नेतागिरी करने का मौका था और तब ऐसे कई जंतु मिलते तो यह लाइब्रेरी और यहां का ज्ञान काम आता। पत्रकारिता में आते पता चला कि वाम विचारधारा का राजनीति की मुख्यधारा में कितना दखल है और यह भी कि इसे ऐसी धारा माना जाना चाहिए जो सत्ता से ज्यादा अपना इको सिस्टम गढ़ने में ताकत लगाती है। इसी बीच पूर्व नक्सल रहे संपादक मिले जो इस सिस्टम के काम करने के तरीकों को बहुत बेहतर जानते थे, उन्होंने इतना बताया कि लगने लगा मैं इनका सिस्टम समझने लगा हूं लेकिन पिछले कुछ समय में यह समझ आया कि जब डोभाल, शाह और खुद मोदी तीन कार्यकाल में एक इको सिस्टम को ध्वस्त करने में पसीना बहा रहे हैं तो वह सामान्य समझ से तो बाहर ही होगा। हां, यह मानने में किसी को दिक्कत नहीं होना चाहिए कि कैडर बनाने और जांचा परखा मजबूत कैडर तय करने में इनका कोई जवाब नहीं रहा है। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के चुनावों को लेकर हो रही चर्चा में जब यह कहा गया कि वाम तो वहां खत्म है, मैंने तुरंत असहमति दर्ज कराई। वजह यह कि आप और हमारी नजर में भले ममता ने वाम से लड़ाई लड़ी हो और उसे कथित तौर पर खत्म कर दिया हो लेकिन सच यह है कि आज टीएमसी का कैडर वही है जो वाम का था। नाम बदले लेकिन विचारधारा? ममता सिंगूर में टाटा को फैक्ट्री न लगाने देने की जो जिद कर मजबूत हो रही थीं वह सोच कहां से आ रही थी? अब तो खैर इंडी गठबंधन के अधिकतर सदस्य वैसा ही सोच रहे हैं जो सोच वाम की रही है। अगला ही तर्क आया कि संसद में कोई सांसद ही न बचा हो, केरल के अलावा जो पार्टी कहीं सत्ता में न बची हो उसका भी अस्तित्व खत्म न मानें? सच यह है कि अब कांग्रेस ठीक वहीं जाकर टिकती है, अखिलेश उसी सोच के झंडे उठाए घूमते हैं और इंडी के हर छोटे बड़े सदस्य ने यह मान लिया है कि वाम भले सामने से न नजर आए लेकिन उसकी अराजक सोच ही उन्हें जिंदा रख सकती है। एआई समिट में कांग्रेस का नग्न प्रदर्शन क्या है? ज्यादा दूर क्यों जाना यदि जेएनयू में ब्राम्हणवाद से आजादी के नारे लगाने में ‘मिश्रा’ ही सबसे आगे हों तो आप समझ सकते हैं कि बस्तर से भले समयसीमा में नक्सली खत्म हो रहे हैं लेकिन सभी अब अर्बन नक्सल की तरह ज्यादा दूर तक फैल गए हैं। अभी तक वाम यदि एक कांच था तो अब उसके टूटने के बाद फैली किरचें ज्यादा घातक साबित हो रही हैं। ‘तिवारी’ को पीटने वालों में शर्मा, पांडे या अवस्थियों का झुंड आ गया था तो आप समझ लीजिए कि ‘बकवास व्यक्ति’ से बचने की सलाह समय पर न मिलने का कैसा असर बच्चों पर दिख रहा है। मेरे पास बहुत शुक्राना है कि उस दिन, उस समय उन सज्जन ने मुझे मामूली सी जो सीख दी थी वह आज तक काम आ रही है। वैसे इसके बाद वामियों को खदेड़ने का एक मंत्र खुद वामी रहे एक सज्जन ने भी दिया। उनका कहना था कि वाम को वैचारिक मानना ही गलत है क्योंकि इनके पास सोच नाम की कोई चीज नहीं है। ये नाराजीवी होते हैं, इन्हें ‘धर्म अफीम है’ जैसे कुछ चुनिंदा नारे रटा दिए जाते हैं और कुतर्क करना सिखा दिया जाता है जिसके दम पर ये खुद को वैचारिक तौर पर मजबूत साबित करने की जीतोड़ कोशिश करते हैं। इसका उदाहरण उन्होंने सहज अंदाज में दिया कि मान लीजिए एक वामी कह रहा है किसानों का शोषण हो रहा है। अब आप यदि उसे तर्क देकर समझाएंगे कि कुछ ही समय में आपने फसल के दाम दोगुना देने शुरु कर दिए हैं तो मान लीजिए कि उसने आपको अपने कीचड़ में उतार लिया है और अब आप उससे पार नहीं पा सकेंगे। वह बताएगा कि खेती कितनी मेहनत का काम है, दोगुना दाम भी बहुत कम पड़ता है, मजदूरी से भी कम पैसा बचता है वगैरह वगैरह…लेकिन यदि आपने प्रतिप्रश्न कर लिया कि क्या आटे का दाम तीन गुना कर दिया जाए तो वह भाग खड़ा होगा। वामी सिर्फ बुराइयां गिनाने के काम में माहिर होता है लेकिन जैसे ही उससे आप वैकल्पिक व्यवस्था समझना चाहेंगे वह तुरंत रफूचक्कर हो जाएगा। हर फैक्टरी, हर संस्थान में खड़ी की गई यूनियनों ने कितने मामले सुलझाए हैं इसका रिकॉर्ड कभी भी उलझाए गए मामलों की संख्या से पार नहीं पा सकेगा। खुद मैंने एक बड़े वामी सांसद और अब दुनिया से कूच कर चुके नेता को किसी कॉलेज कैंपस में प्रिंसिपल पर हमले की राय देते सुना। वे वॉशरुम में आकर ये बात कर रहे थे और मजे की बात यह कि हम ठीक उस मंच के पीछे थे जिसमें कुर्सियों पर भाजपा से निपटने के लिए कई सारे दल एकजुट हो रहे थे। ये सांसद भी मंच पर आकर कई दूसरे दलों के लोगों के साथ हाथ में हाथ मिलाए खड़े हुए थे। सच तो यह है कि इनका जाल बेहद बारीकी से बुना होता है। बमुश्किल कोई इनके चंगुल से तभी बच पाता है जब कोई बकवास व्यक्ति से बचने की राय सही समय पर दे दे वरना उर्वर दिमागों में विषबेल के बीज बोने के लिए इनके अर्बन नक्सल हर पल आपके आसपास मंडराते मिलेंगे। हद यह है कि इन विषबेलों से बचाने के लिए कहीं कोई सलाह सेंटर तक नहीं है जो प्रतिप्रश्न करने की ट्रेनिंग दे सके, जो वामी को इतना ही जवाब देने प्रशिक्षण दे कि जब कोई कहे कि धर्म तो अफीम है तो आप कह दें कि वामी सोच तो कोकीन या उससे भी कहीं प्यूरीफाइड खतरनाक नशा है।
