February 25, 2026
देश दुनिया

BBC वाले कंट्री हेड और सहाफ़ी से बावर्ची का सफ़र

अमरिक्का से मनजी की कलम आज समोसे-कचोरी और अखबारी के संबंध पर

एंडीया की एक खबर ने मीर मुंशी जी को आकर्षित किया। बीबीसी के कोई एक पत्रकार है जिन्होंने पत्रकार का पेशा छोड़ कचौरी बेचनी शुरू की है। इन्ने एक ढाबा टाइप कुछ खोला है जिधर ये कचौड़ी समोसे आदि बनाते और परोसते है।

दरअसल सहाफ़ी ( पत्रकार) से बावर्ची बनने का सफ़र मुग़लिया काल से चला आ रहा है।

अकबर के चहेते पत्रकार लेखक हुआ करते थे अबुल फ़ज़ल जिनमें किताबें लिखी, अकबरी दरबार में अख़बारची का भी काम किया। अबुल फ़ज़ल अकबर को ख़बरें पढ़कर सुनाया करता था।

बहुत कम लोग जानते है अबुल फ़ज़ल लेखक सहाफ़ी के अलावा पेटू भुक्खड़ और फ़ूड ब्लॉगर भी था।अबुल फ़ज़ल ने अकबर के बावर्चीखाने के बारे में लिखा है चार सौ ख़ानसामे थे- एक शाही बावर्ची खाने का इक्स्क्लूसिव वज़ीर था। कुछ रेसिपी भी लिखी है जैसे सेर भर बड़े का मांस मिलाकर क्या क्या बनाया जाता है। हुक्के का इस्तेमाल से लेके प्याज़ लहसुन और अदरक का हर डिश में प्रयोग। ये भी अबुल फ़ज़ल लिखता है शाही हकीम का काम था खाने का अवलोकन करना कि खाना हेल्थी होने के साथ aphrodiatic मतलब यौन वर्धक हो।

तो एक बात तो साफ़ है- जो जितना बड़ा सहाफ़ी होगा, पत्रकार होगा, देर सबेर वो ढाबा वाला, कचौड़ी वाला जुरूर बनेगा। लिहाज़ा बीबीसी वाले ये पत्रकार भी कचौड़ी बेच रहे है।

ज़ियादा दूर क्यों जाना। महज़ कुछ साल पहले तक एनडीटीवी के एक मशहूर पत्रकार एंकर भी अपने अंतिम दिनों में शहर शहर कस्बों की चटोरी गलियों में घूमते पाये जाते थे। कुछ समय पहले खुदागंज की सैर पे गए है किंतु आप परले दर्जे के चटोरे थे- इतने स्वाद ले ले के रिपोर्टिंग करते थे कि देखने पढ़ने वाला टीवी में घुस उनकी प्लेट से ही खाना चुग लें।

तो ये बात समझनी बहुत बहुत जुरूरी है कि सहाफ़ी से बावर्ची बनना ही पत्रकार का अंतिम पड़ाव है।

आजकल तो ढेरों पत्रकार ठलुआ बैठे है- टीवी चैनल पे काम नहीं मिल रहा तो यूट्यूब चैनल पे ही लगे हुए है। अब यूट्यूब वाला भी कितना रेवन्यू दे देगा, उधर लोग जाते है, यूट्यूब वीडियो भगा कर देखते है, चार पाँच फ़ारसी के शब्द कमेंट में लिख के भाग आते है। कितने व्यूज़ मिलेंगे ऐसे और कैसे घर का खर्चा चलेगा। इस से बढ़िया है समोसे कचौड़ी ही बेच लो।

जिस देश के वज़ीर ए आला कह चुके हो- पकौड़े बेचना भी रोजगार है तो उस देश के सहाफ़ी गर ठेले लगा ले तो क्या बुरी बात है।

वक्त का तक़ाज़ा है कि अबुल फ़ज़ल की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए रविश जी लिट्टी चोखा का ठेला लगाएं, लिपस्टिक वाले शर्मा जी धान प्लस गेहूँ की बिरयानी की रेहड़ी लगायें, आशुतोष कोयले पे सिके हुए भुट्टे बेचें और अंजुम जी टुंडे कबाब की फ्रैंचाइज़ पे काम करें।

सहाफ़ी की क़लम जब सूखती है, तो उसकी कड़छी चमकती है।और जो ख़बर में नमक कम पड़ जाए, उसे बाज़ार में चाट बना कर बेच देना चाहिए क्योंकि इस मुल्क में सच चाहे बिके न बिके, समोसा हमेशा बिकता है!