Basant Panchmi पर धार में तनाव कब तक आखिर, आखिर कब तक
धार की भोजशाला, आखिर मसला कहां अटका है
- आदित्य पांडे
मालवा का ऐतिहासिक नगर धार हर साल बसंत पंचमी से पहले राष्ट्रीय सुर्खियों में आ जाता है और यह दिन शांतिपूर्वक निकल जाए तो भी खबर बनती है। मालवा का सांस्कृतिक शिल्पकार कहे जाने वाले राजा भोज ने 1034 ईस्वी में धार में भोजशाला का निर्माण देवी सरस्वती के मंदिर बतौर कराया। इसका इतिहास शुरू हुआ ही था कि 12वीं–13वीं शताब्दी में मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया और उसी परिसर में आक्रमणकारियों ने मकबरा तथा मस्जिद का निर्माण करा दिया।
लगभग छह सदी बाद भारतीय पुरातत्व में रुचि रखने वाले जर्मन विद्वान एलॉइस एंटोन फ्यूहरर ने 1893 में इसे ‘भोजशाला’ बताया। बाद में ब्रिटिश प्रशासन में के.के. लेले ने यहां मिले संस्कृत शिलालेखों का अध्ययन करवाया और इससे साफ पता चला कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों से पुनर्निर्मित है। भोजशाला का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आघात 1857 में हुआ, जब ब्रिटिश अधिकारी विलियम किडकेड वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा को लंदन ले गए। आज भी यह मूर्ति ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित है। 1961 में इतिहासकार विष्णु श्रीधर वाकणकर ने लंदन जाकर इसके भारतीय मूल के प्रमाण प्रस्तुत किए, लेकिन प्रतिमा वापस नहीं आई। आजादी के बाद 1951 में भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। इसके बाद धार्मिक समुदायों के बीच टकराव की स्थिति बनी। 1952 में हिंदू समाज ने यहां भोज दिवस मनाना शुरू किया जबकि उसके अगले साल यानी 1953 से मुस्लिम समुदाय ने यहां उर्स का आयोजन प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार एक अनौपचारिक व्यवस्था बनी रही कि शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय नमाज अदा करता और बसंत पंचमी पर हिंदू समुदाय पूजा करता लेकिन यह बात सिर्फ समझौते की तो थी नहीं आखिर जगह पर किसी का तो हक तय करना जरुरी ही है ताकि लंबे समय से समझौते से चल रही व्यवस्था का कोई स्थाई समाधान हो सके। यूं भी भोजशाला का विवाद केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक स्मृति का प्रश्न भी है। हिंदू पक्ष तार्किक तौर पर सरस्वती मंदिर मानता है और बसंत पंचमी पर पूजा का अधिकार चाहता है। सुबह पूजा, दोपहर में नमाज और शाम तक फिर पूजा वाला फॉर्मूला 2003 से अटल बिहारी बाजपेई के सुझाव और दिग्विजय के मुख्यमंत्रित्वकाल से चला आ रहा है और इसी को इस बार सुप्रीम कोर्ट ने भी अस्थाई व्यवस्था बतौर लागू करने को कह दिया लेकिन आखिर कब तक। प्रशासन ने इस बार फिर यहां शांतिपूर्ण ढंग से दोनों संपन्न करा दिए लेकिन क्या धार हमेशा ऐसे ही सैकड़ों कैमरों, हजारों पुलिसकर्मियों और घुट घुटकर रह रहे नागरिकों के साथ हर साल बसंत पंचमी मनाएगा?
