मीडिया कैमरों, इस बार जल्दी वापस आना
विशेष रिपोर्ट- प्रशांत सिंह
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के छात्र हैं)
ये माइक हाथ में लिए जिस्ट न्यूज़ की रिपोर्टर मेधा हैं । इस तस्वीर में उन्होंने किसी दूसरी चीज को देखने के लिए अपना सर नहीं घुमाया है।ये जिन दो मांझी दंपति से बात कर रही हैं, उनकी आंखों में इनसे देखा नहीं जा रहा है। सामने बैठी महिला ने बताया कि जब मुख्यमंत्री का दौरा होने वाला था तो मुख्यमंत्री की जाति का आदमी इनसे आकर कहता है की रोड के किनारे बने छप्पर के घर को छोड़ के भाग जाओ, इनकी बेटी के सामने गंदी गालियाँ देता है और इस दुर्व्यवहार की वजह, राज्य के मुख्यमंत्री के दौरे की ख़ूबसूरती प्रभावित होगी, तो मेधा जी की आँखों के आँसू इनकी पत्रकारिता की प्रतिबद्धता का बांध तोड़ कर छलक आए हैं। बिहार में चुनाव समाप्त हो गए हैं। नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री बन गए हैं। मुख्य धारा मीडिया के रिपोर्टर बिहार चुनाव कवर करके वापस आ चुके हैं । ये वाक्य कि “चुनाव कवर करके वापस आ गए हैं ”ही सब कुछ बता रहा है।
बिहार अब फिर किसी चुनाव का इंतज़ार करेगा। आने वाला लोक सभा का चुनाव जो संभवतः चार साल में होगा शायद फिर से इन रिपोर्टरों को बिहार ले आए।
ये कितना शानदार है कि बिहार चुनाव की समीक्षा में कितने अलग अलग आयामों में व्याख्या हो रही है। नीतीश कुमार की जादुई समझ के बारे में, महागठबंधन और जनसुराज की हार के बारे में ।
देश के सारे बड़े मीडिया चैनल्स ने ये चुनाव कवर किया जिसमें “बुलेट कैमरा इलेक्शन”, “कार में सरकार” जैसी कवरेज अलग ही चमकती नजर आई। इन सब के बीच डिजिटल दुनिया से गए लगभग सभी पत्रकारों के कैमरे पर भूख,लाचारी,पलायन दर्ज हुआ है। जो अन्य राज्यों के चुनाव के समय “डेवलपमेंट” वाले दायरे जिसमें रोड बिजली पानी चिकित्सा जैसे मुद्दे आते हैं, से कितना अलग और निराला है।
कितने ही रिपोर्टरों ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत ही अदम गोंडवी जी की लाइनों (आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को मैं चमारों की गली में ले चलूँगा आपको ) से की।
बिहार की रिपोर्टिंग के दौरान कितने ही ऐसे वीडियो दर्ज हुए हैं जो इंसानियत की रूह हिला दे। सभ्य लोगों की दुनिया,हमारी दुनिया, जानवरों के अधिकारों को लेकर बात कर रही है। होनी भी चाहिए पर कितना आश्चर्य है कि जो बोल के बता रहें हैं की भूख लगी है, हमें भी पढ़ना है जीना है,उनकी सुनने वाला कोई नहीं मिल रहा। हम सच में दुनिया के विकास का कौन सा फार्मूला लगा के बैठे हैं कि दुनिया में करोड़ों लोग जीने में ही हाँफ दे रहे हैं। लगभग सभी ने ही अपनी समझ और सहूलियत से ये चुनाव कवर किया है।
परंतु जिस तरह JIST NEWS की रिपोर्टर मेधा, और NEWSPINCH के रिपोर्टर अभिनव पांडे ने कवर किया है वो जवाब हैं उन सभी आवाजों का जो कहते हैं कि जाति बीते जमाने की बात हो गई। NEWSPINCH यू ट्यूब चैनल पर रिलीज हुई डॉक्यूमेंट्री “मुसहर” याद की जाएगी अपने इस डॉक्यूमेंटेशन के लिए जिसमें अभिनव ने दर्ज किया है मुसहर समाज का वह पक्ष जिसे देखकर ख़ुद को सभ्य कहने वाले समाज को उबकाई आ जाए।

(ये चौदह साल की एक बच्ची वर्षा है जो माँ बनी है इनकी कहानी कहते अभिनव ) इस डॉक्यूमेंट्री में अभिनव ख़ुद कहते है कि जिस बच्ची से ये पूछा जाना चाहिए था की बेटा किस क्लास में पढ़ती हों ,क्या खेलना पसंद है ?उससे पूछ रहा हूँ कि सरकार की मातृबंदन योजना का लाभ मिला कि नहीं।

(ये पथराई आँखों वाले वृद्ध का बेटा पोता तीनो ही मजदूरी कर रहे हैं और इन्हें विश्वास है की इनकी आने वाली पीढ़ी भी ऐसे ही खटते हुए मर जाएगी)

(ये वो महिलायें हैं जिनके चार बच्चे हैं और ये इतनी कम उम्र में विधवा हो गई हैं। इनके पास ना तो अपने पति के मृत्यु का प्रमाण पत्र है जिसे ये सरकार को दिखा के उनसे अपने लिए किसी तरह की मदद की गुहार लगा सकें,ना ही कोई ऐसा समुचित रोजगार जिससे ये अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकें।) इनकी दशा कैलाश गौतम जी की कविता “कचहरी ना जाना” बता सकती है ।
वे लिखते है –
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पे सरसों उगते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है

ये बच्चे अगले पाँच सालों में अगर जीवन की लड़ाई जीत पाए तो फिर मिलेंगे इन रिपोर्टरों को।
बस इतनी ही दुआ की जा सकती है कि तब ये स्कूल में मिलें या खेलते मिले, पेट की भूख के लिए मूस मारते या मजदूरी करते नहीं।
इनके हिस्से का मैं इतना ही कह सकता हूँ – अबकी बार जल्दी वापस आना।
-प्रशांत सिंह
