February 11, 2026
वर्ल्ड

Epstien को भेजे गए ‘कपड़े के बेशकीमती टुकड़े’ और उनका हश्र

अमेरिका से बकलम ‘मनजी’

आजकल एपस्टीन फाइल पे खूब माहौल गर्म है- अनेक लोग कहते है इसपे कुछ लिखो। इसपे लिखने को शेष ही क्या है- अब तब बहुत लिखा जा चुका है- आगे और भी आयेगा।

इस फाइल से एक दिलचस्प किस्सा जानिये।

इस एपस्टीन जंतु ने काबा शरीफ पे चढ़े पवित्र पर्दे क़िबला के टुकड़े सऊदी से मंगवाए थे ताकि उन्हें अपने घर पे गलीचे- कालीन- कारपेट की तरह इस्तेमाल कर सकें। भेजने वाली शेखनी ने उसे कहा भी है- इस पर्दे पे करोड़ों लोग अपनी श्रद्धा से चूमते है। ईमेल में साफ़ साफ़ लिखा भी है। भेजने वाली का नाम अज़ीज़ा है जिसने ये क़िबला का वो बेशकीमती टुकड़ा एप्स्टीन को भेजा था। मालूम है- इस कपड़े की कितनी अहमियत और श्रद्धा है और इस जंतु ने उस टुकड़े को क़ालीन की तरह इस्तेमाल किया!

खोदा एप्स्टीन की रूह को गर्म देग में पकौड़े की तरह फ्राई करें।

आइये मिल के लाहौल पढ़ें-

लाहौल बिलाकुबत इल्ला बिल्लाईल अज़ीम नाउज बिल्लाहे मिनश मैंताने इल रजीम – असतश फिर उल्लाह!

नॉर्वे के राजनयिक का बयान भी देख लें

एपस्टीन फाइल में एक रुक्का ऐसा भी है जिसे पढ़कर समूचे हिंदुस्थान का रक्त उबाल मारना चाहिए किंतु ना जाने कोई भी इस रुक्के की बात नहीं करता ! इन कुख्यात फाइल में बरस 2015 की एक ईमेल का जिक्र है जिसमें एपस्टीन ने नॉर्वे के एक राजनयिक को ईमेल भेजा – संदर्भ भारत था। राजनयिक ने उत्तर में लिखा-

यदि तुम्हें सांप और भारतीय एक साथ दिखें तो सबसे पहले भारतीय को मारो। इस ईमेल, फाइल के इस रुक्के पे हर भारतीय को ऐतराज होना चाहिए। माँग करनी चाहिए कि सरकार नॉर्वे दूतावास से राजदूत तलब करें और स्पष्टीकरण मांगे। किंतु सत्ताधीश दल क्या और विपक्ष क्या- दोनों ही इस ईमेल पे ऐतराज़ तो छोड़िये, बात तक नहीं कर रहे। और वे करें भी क्यों? आख़िर देश के कोने कोने , यूनिवर्सिटी आदि में ये कहावतें जो चलती है- यदि तुम्हें सांप और ब्राह्मण एक साथ दिखें तो सबसे पहले ब्राह्मण को मारो। यदि तुम्हें सांप और बनिया एक साथ दिखें तो सबसे पहले बनिए को मारो। इच्छा अनुसार इस कहावत को लोग अपनी सुविधा अनुसार प्रयोग करते आए है, कर रहे है , आगे भी करेंगे।

चुनांचे गलती न एपस्टीन की थी, न उस नॉर्वेजियन राजनयिक की। गलती तो हमारी है—जो सदियों से अपने ही समाज के अलग अलग तबकों के लिए साँप से बदतर उपमाएँ गढ़ते आए, उन्हें दोहराते आए और तालियाँ बजाते आए। जब हम ख़ुद ही तय कर चुके हों कि कौन पहले मारा जाएगा, तो विदेशियों से राष्ट्रसम्मान की उम्मीद करना भी बेमानी है।