February 11, 2026
साहित्य समाचार

दो अखबार, एक लेखक और बर्बर बाबर

भोपाल के लिटरेचर फेस्टिवल में हुए विवाद की बात प्रधानमंत्री तक पहुंची
एक अखबार है बड़ा और रसूखदार, खबरें परोसने के अलावा जिन पचासों धंधों से जुड़ा है उनमें सम्मान करने के अलावा लिटरेचर के नाम पर उठापटक भी शामिल है। दूसरा अखबार है पांचजन्य यानी संघ के मुखपत्र के बाद सबसे ज्यादा दक्षिणपंथी माना जाने वाला, नाम है स्वदेश। पहले अखबार ने धमक-चमक के दम पर भारत भवन में तीन दिनी आयोजन रखा तो दूसरे अखबार ने तलाशना शुरु किया कि इन्होंने गड़बड़ कहां कहां की। कार्यक्रम की लिस्ट में एक किताब और उसके लेखक का नाम देखकर लगा कि यहां मसाला मिल जाएगा। किताब का नाम’द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान’और आभास मलदहियार नाम के इसके लेखक हैं। आभास को जो सेशन दिया गया वह था भोपाल का वह वसीयतनामा जो बाबर का बताया जाता है और जिसे वामपंथी खूब सामने रखते हैं। तो हुआ यूं कि स्वदेश को किसी ने बता दिया कि एलजीबीटी को बढ़ाने वाले और तमाम वामपंथी सोच वालों को मंच देने के क्रम में ही आभास को बुलाया गया है और वो बाबर का महिमामंडन करने वाले हैं। खबर पक गई तो पाठकों को परोस भी दी गई बिना इस बात की तस्दीक किए कि कहीं लेखक अपने ही खेमे का तो नहीं है। कुछ उत्साहियों ने घोषणा कर दी कि न आभास की किताब आएगी और न उनका सेशन होने दिया जाएगा। लेखक कार्यक्रम के लिए पहुंचे तो आयोजकों ने उन्हें बताया कि उनका मंच पर होना संभव नहीं होगा। प्रदेश शासन के प्रायोजकों में होने पर भी सवाल थे और भारत भवन में कार्यक्रम की अनुमति को लेकर भी लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा बाबर था। आभास को आभास भी नहीं था कि जिस वामपंथी नैरेटिव को तोड़ने के लिए वो जमकर मेहनत कर रहे हैं, बाबर की हकीकत सामने रखने के लिए अपने पांच साल लगा रहे हैं और बाबरनामा पढ़ने के लिए फारसी भी सीख रहे हैं, उन्हें बिना किताब पढ़े उसी वामपंथ का पथिक मान लिया जाएगा। प्रदेश के संस्कृति मंत्री ने जब स्वदेश की खबर पढ़ी तो उन्हें तो इस सेशन की भर्त्सना करना ही थी, साहित्य अकादमी के मुखिया ने भी इस कार्यक्रम से दूरी होने का सार्वजनिक संदेश जारी कर दिया। लेखक का इस कारण तो हैरान होना बनता ही था कि अपने ही खेमे से विरोध की ऐसी ज्वाला क्यों भड़क रही है लेकिन इससे भी बड़ा हैरानी का कारण यह कि एक दमखम वाले अखबार की अगुवाई में हो रहे कार्यक्रम से उनको दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका गया। कहीं इस बात का जिक्र तक नहीं कि ऐसी किसी किताब का भी आना तय था या भोपाल के वसीयतनामे जैसे किसी विषय पर बात होनी भी थी। बड़े अखबार ने इस लेखक, पुस्तक और सेशन को छोड़कर बाकी सब का कवरेज किया बल्कि जमकर किया। आभास ने अब सीधे प्रधानमंत्री को लंबा सा पत्र लिखकर पूरा मामला सामने रखा है और जिस जिसने विरोध किया उन सभी से कहा है कि वे किताब का एक भी ऐसा पन्ना सामने रख दें जिसमें बाबर का महिमामंडन हो। मंत्री लोधी से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय संस्कृति मंत्री तक के साथ सीधे पीएमओ तक आभास ने बात पहुंचाई है और जवाब मांगा है स्वदेश अखबार से कि आपकी रिपोर्टिंग ने जो मेरा नुकसान किया है उसका क्या करें। आभास ने कहा है कि यदि आपने मुझे उत्तर नहीं दिया तो मैं प्रकाशक और इस खबर को लिखने वाले पर मानहानि का मुकदमा कर दूंगा। मेरा सवाल बस इतना है कि यदि स्वदेश पर मुकदमा किया जा सकता है तो आखिर आयोजक-प्रायोजक को क्यों छोड़ना?